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सर्व कार्य सिद्धि देने वाला श्री उच्छिष्ट गणेश कवच – पूर्ण विधि, नियम और लाभ




सर्व कार्य सिद्धि देने वाला श्री उच्छिष्ट गणेश कवच – पूर्ण विधि, नियम और लाभ


जय महाकाल मित्रों 
हिन्दू धर्म में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, बुद्धि के दाता और सभी कार्यों में सफलता प्रदान करने वाला माना गया है। विशेष रूप से उच्छिष्ट गणेश का स्वरूप अत्यंत गूढ़, तांत्रिक और शीघ्र फल देने वाला माना जाता है। यह साधना उन साधकों के लिए अत्यंत प्रभावशाली है जो जीवन में आर्थिक उन्नति, बाधा नाश और सर्व कार्य सिद्धि चाहते हैं।इस लेख में हम आपको श्री उच्छिष्ट गणेश कवच, उसकी सही विधि, नियम, और अद्भुत लाभ विस्तार से बताएंगे।

उच्छिष्ट गणेश कवच क्या है?
उच्छिष्ट गणेश कवच एक दिव्य तांत्रिक स्तोत्र है, जो साधक को हर प्रकार की नकारात्मक शक्तियों, बाधाओं और विघ्नों से सुरक्षा प्रदान करता है। यह कवच शरीर के प्रत्येक अंग की रक्षा करता है और साधक को आत्मिक तथा भौतिक दोनों प्रकार की सिद्धियां प्रदान करता है।


श्री उच्छिष्ट गणेश कवच (मूल पाठ)

॥ श्री उच्छिष्ट गणेश कवच ॥

ऋषिर्मे गणकः पातु, शिरसि च निरन्तरम्।
त्राहि मां देवी गायत्री, छन्दः ऋषिः सदा मुखे।।१।।
हृदये पातु मां नित्यमुच्छिष्ट-गण-देवता।
गुह्ये रक्षतु तद्-बीजं, स्वाहा शक्तिश्च पादयो।।२।।
काम-कीलकं सर्वांगे, विनियोगश्च सर्वदा।
पार्श्व-द्वये सदा पातु, स्व-शक्तिं गण-नायकः।।३।।
शिखायां पातु तद्-बीजं, भ्रू-मध्ये तार-बीजकम्।
हस्ति-वक्त्रश्च शिरसि, लम्बोदरो ललाटके।।४।।
उच्छिष्टो नेत्रयोः पातु, कर्णी पातु महात्मने।
पाशांकुश-महा-बीजं, नासिकायां च रक्षतु।।५।।
भूतीश्वरः परः पातु, आस्यं जिह्वा स्वयंवपु।
तद्-बीजं पातु मां नित्यं, ग्रीवायां कण्ठ-दर्शके।।६।।
गं बीजं च तथा रक्षेत्, तथा त्वग्रे च पृष्ठके।
सर्व-कामश्च हृत्पातु, पातु मां च कर-द्वये।।७।।
उच्छिष्टाय च हृदये, वह्नि-बीजं तथोदरे।
माया-बीजं तथा कट्यां, द्वावूरु सिद्धि-दायकः।।८।।
जंघायां गण-नाथश्च, पादौ पातु विनायकः।
शिरसः पाद-पर्यन्तमुच्छिष्ट-गण-नायकः।।९।।
आपाद्-मस्तकान्तं च, उमा-पुत्रश्च पातु माम्।
दिशोष्टौ च तथाऽऽकाशे, पाताले विदिशाष्टके।।१०।।
अहर्निशं च मां पातु, मद-चञ्चल-लोचनः।
जलेऽनले च संग्रामे, दुष्ट-कारा-गृहे वने।।११।।
राज-द्वारे घोर-पथे, पातु मां गज-नायकः।
इदं तु कवचं गुह्यं, मम वक्त्रात् विनिर्गतम्।।१२।।
त्रैलोक्ये सततं पातु, द्वि-भुजश्च चतुर्भुजः।
बाह्यमभ्यन्तरं पातु, सिद्धि-बुद्धि-विनायकः।।१३।।
सर्व-सिद्धि-प्रदं देवि ! कवचमृद्धि-सिद्धिदम्।
एकान्ते प्रजपेन्मन्त्रं, कवचं युक्ति-संयुतम्।।१४।।
इदं रहस्यं कवचमुच्छिष्ट-गण-नायकम्।
सर्व-वर्मसु देवेशि ! इदं कवच-नायकम्।।१५।।
एतत् कवच-माहात्म्यं, वर्णितु नैव शक्यते।
धर्मार्थ-काम-मोक्षादि, नाना-फल-प्रदं नृणाम्।।१६।।
शिव-पुत्रः सदा पातु, पातु मां च सुरार्चितः।
गजाननः सदा पातु, गण-राजश्च पातु माम्।।१७।।
सदा शक्ति-रतः पातु, पातु मां काम-विह्वलः।
सर्वाभरण-भूषाढ्या, पातु मां सिन्दुरार्चितः।।१८।।
पञ्च-मोद-करः पातु, पातु मां पार्वती-सुतः।
पाशांकुश-धरः पातु, पातु मां च धनेश्वरः।।१९।।
गदा-धरः सदा पातु, पातु मां काम-मोहितः।
नग्न-नारी-रतः पातु, पातु मां च गणेश्वर।।२०।।
अक्षय्य-वरदः पातु, शक्ति-युक्तः सदाऽवतु।
भाल-चन्द्रं सदा पातु, नाना-रत्न-विभूषितः।।२१।।
उच्छिष्ट-गण-नाथश्च, मद-घूर्णित-लोचनः।
नारी-योनि-रसास्वादः, पातु मां गज-कर्णकः।।२२।।
प्रसन्न-वदनः पातु, पातु मां भग-वल्लभः।
जटा-धरः सदा पातु, पातु मां च किरीट-धृक्।।२३।।
पद्मासन-स्थितः पातु, रक्त-वर्णश्च पातु माम्।
नग्न-साम-पदोन्मतः, पातु मां गण-दैवतः।।२४।।
वामांगे सुन्दरी-युक्तः, पातु मां मन्मथ-प्रभुः।
क्षेत्र-प्रवसितः पातु, पातु मां श्रुति-पाठकः।।२५।।
भूषणाढ्यस्तु मां पातु, नाना-भोग-समन्वितः।
स्मिताननः सदा पातु, श्रीगणेश-कुलान्वितः।।२६।।
श्री-रक्त-चन्दन-मयः, सुलक्षण गणेशः।
श्वेतार्क-गणनाथश्च, हरिद्रा-गण-नायकः।।२७।।
परिभद्र-गणेशश्च, पातु सप्त-गणेश्वरः।
प्रवालक गणाध्यक्षो, गज-दन्तो गणेश्वरः।।२८।।
हर-बीज-गणेशश्च, भद्राक्ष-गण-नायकः।
दिव्यौषधि-समुद्भूतो, गणेशश्चिन्तित-प्रदः।।२९।।
लवणस्य गणाध्यक्षो, मृत्तिका-गण-नायकः।
तण्डुलाक्ष-गणाध्यक्षो, गो-मयस्य गणेश्वरः।।३०।।
स्फटिकाक्ष-गणाध्यक्षो, रुद्राक्ष-गण-दैवतः।
नव-रत्न-गणेशश्च, आदि-देवो गणेश्वरः।।३१।।
पञ्चाननश्चतुर्वक्त्रो, षडानन-गणेश्वरः।
मयूर-वाहनः पातु, पातु मां मूषकासनः।।३२।।
पातु मां देव-देवेशः, पातु माम् ऋषि-पूजितः।
पातु मां सर्वदा देवो, देव-दानव-पूजितः।।३३।।
त्रैलोक्य-पूजितो देवः, पातु मां च विभुः प्रभुः।
रंगस्थं च सदा पातु, सागरस्थं सदाऽवतु।।३४।।
भूमिस्थं च सदा पातु, पातालस्थं च पातु माम्।
अन्तरिक्षे सदा पातु, आकाशस्थं सदाऽवतु।।३५।।
चतुष्पथे सदा पातु, त्रि-पथस्थं च पातु माम्।
बिल्वस्थं च वनस्थं च, पातु मां सर्वतः स्थितम्।।३६।।
राज-द्वार-स्थितं पातु, पातु मां शीघ्र-सिद्धिदः।
भवानी-पूजितः पातु, ब्रह्मा-विष्णु-शिवार्चितः।।३७।।
फलश्रुति
इदं तु कवचं देवि ! पठनात् सर्व-सिद्धिदम्।
उच्छिष्ट-गणनाथस्य, स-मन्त्रं कवचं परम्।।१।।
स्मरणाद् भूपतित्वं च, लभते सांगतां ध्रुवम्।
वाचः-सिद्धि-करं शीघ्रं, पर-सैन्य-विदारणम्।।२।।
सर्व-सौभाग्यदं शीघ्रं, दारिद्रयार्णव-घातकम्।
सु-दार-सु-प्रजा-सौख्यं, सर्व-सिद्धि-करं नृणाम्।।३।।

इस कवच का नियमित पाठ करने से:
कार्यों में सफलता मिलती है
धन की वृद्धि होती है
शत्रु पर विजय प्राप्त होती है
वाणी में शक्ति आती है

साधना करने की सही विधि:–
उच्छिष्ट गणेश कवच की साधना करते समय कुछ विशेष नियमों का पालन करना आवश्यक है:
. शुभ समय का चयन
इस साधना को बुधवार, चतुर्थी या किसी भी शुभ मुहूर्त में शुरू करें
रात्रि का समय (विशेषकर मध्य रात्रि) अधिक प्रभावशाली माना जाता है स्थान का चयनएकांत और शांत स्थान चुनें
पूजा स्थल साफ और पवित्र होना चाहिए पूजन सामग्री
गणेश जी की प्रतिमा या चित्र लाल फूल दूर्वा (घास) सिंदूर धूप और दीप मोदक या लड्डू आसन और दिशा
लाल या पीले आसन पर बैठें पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख रखें साधना की प्रक्रिया  स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें
गणेश जी का ध्यान करें और दीपक जलाएं अपने गुरु का स्मरण कर आशीर्वाद लें गणेश जी को फूल, दूर्वा और नैवेद्य अर्पित करें

उसके पश्चात श्रद्धा और विश्वास के साथ उच्छिष्ट गणेश कवच का पाठ करें
 प्रतिदिन कम से कम १० बार पाठ करें

महत्वपूर्ण साधना के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करें
नकारात्मक विचारों से दूर रहें
किसी को साधना के बारे में न बताएं (गोपनीय रखें)
नियमितता बनाए रखें बीच में न छोड़ें

उच्छिष्ट गणेश साधना के अद्भुत लाभ :–

इस कवच के प्रभाव से साधक को अनेक प्रकार के लाभ प्राप्त होते हैं:
. सर्व कार्य सिद्धि
आपके रुके हुए कार्य तेजी से पूरे होने लगते हैं।
. आर्थिक उन्नति
धन की कमी दूर होती है और आय के नए स्रोत बनते हैं।
. वाणी सिद्धि
आपकी बातों में प्रभाव बढ़ता है — लोग आपकी बात मानने लगते हैं।
. शत्रु नाश
गुप्त शत्रु भी समाप्त हो जाते हैं और विरोधी कमजोर पड़ते हैं।
. मानसिक शांति
मन शांत रहता है और आत्मविश्वास बढ़ता है।
. आकर्षण शक्ति
व्यक्ति के व्यक्तित्व में एक अलग आकर्षण आ जाता है।

फलश्रुति (कवच के फल)
इस कवच के बारे में कहा गया है कि:
इसका केवल स्मरण करने से भी लाभ मिलता है
बिना मंत्र, जप या हवन के भी यह प्रभावी है
साधक को राजसुख, सम्मान और प्रतिष्ठा मिलती है
दरिद्रता का नाश होता है
सुखी परिवार और संतान प्राप्ति होती है

–विशेष सावधानी–
यह एक तांत्रिक साधना है, इसलिए इसे हल्के में न लें। यदि संभव हो तो किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही साधना प्रारंभ करें।कोई भी साधना बिना गुरु निर्देश के अथवा गुरु आशीर्वाद के बिना  साधना में सफल होना लगभग असंभव हैं  पूर्ण लाभ अपेक्षित नहीं होगा ||

गुरुजी – 91 9207 283275