अखंड शिव साधना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अखंड शिव साधना लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शिव षड अक्षर मंत्र पाठ - Gupt shiv Mantra


|| जय महाकाल || 


-शिव षड अक्षर मंत्र पाठ -



gupt shiv mantra


ॐकारं बिंदुसंयुक्तं नित्यं ध्यायंति योगिनः ।
कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः ॥१॥
नमंति ऋषयो देवा नमन्त्यप्सरसां गणाः ।
नरा नमंति देवेशं नकाराय नमो नमः ॥२॥
महादेवं महात्मानं महाध्यानं परायणम् ।
महापापहरं देवं मकाराय नमो नमः ॥३॥
शिवं शांतं जगन्नाथं लोकानुग्रहकारकम् ।
शिवमेकपदं नित्यं शिकाराय नमो नमः ॥४॥
वाहनं वृषभो यस्य वासुकिः कंठभूषणम् ।
वामे शक्तिधरं देवं वकाराय नमो नमः ॥५॥
यत्र यत्र स्थितो देवः सर्वव्यापी महेश्वरः ।
यो गुरुः सर्वदेवानां यकाराय नमो नमः ॥६॥
षडक्षरमिदं स्तोत्रं यः पठेच्छिवसंनिधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥७॥

- विधि -

शिवरात्रि के दिन या त्रयोदशी के दिन संध्या काल के समय शिव मंदिर जा कर शिव लिंग पर जल या 
पंचामृत का अभिषेक कर के पंचोपचार से शिव ध्यान पूर्वक पूजन करे वहां भोग धरे कोई मीठा फल 
रख दे कर्पूर से आरती उतारे पश्चात भगवान शिव से आशीर्वाद ले और संकल्प ले कर जल भूमि पर 
छोड़ कर एकाग्र चित्त से यथा शक्ति जाप पाठ करे इसे कल्याण हो कर साधक शिवलोक को प्राप्त होता हैं 

जय महाकाल जय अलख आदेश


 गुरूजी   -   09207 283 275 



शिव स्तुति

शिव स्तुति








सदा – शंकरं, शंप्रदं, सज्जनानंददं, शैल – कन्या – वरं, परमरम्यं ।
काम – मद – मोचनं, तामरस – लोचनं, वामदेवं भजे भावगम्यं ॥१॥
कंबु – कुंदेंदु – कर्पूर – गौरं शिवं, सुंदरं, सच्चिदानंदकंदं ।
सिद्ध – सनकादि – योगींद्र – वृंदारका, विष्णु – विधि – वन्द्य चरणारविंदं ॥२॥
ब्रह्म – कुल – वल्लभं, सुलभ मति दुर्लभं, विकट – वेषं, विभुं, वेदपारं ।
नौमि करुणाकरं, गरल – गंगाधरं, निर्मलं, निर्गुणं, निर्विकारं ॥३॥
लोकनाथं, शोक – शूल – निर्मूलिनं, शूलिनं मोह – तम – भूरि – भानुं ।
कालकालं, कलातीतमजरं, हरं, कठिन – कलिकाल – कानन – कृशानुं ॥४॥
तज्ञमज्ञान – पाथोधि – घटसंभवं, सर्वगं, सर्वसौभाग्यमूलं ।
प्रचुर – भव – भंजनं, प्रणत – जन – रंजनं, दास तुलसी शरण सानुकूलं ॥५॥



विधि ----


संपर्क - 092072 83275




शिव संजीवनी साधना


-जय महाकाल -


शिव संजीवनी साधना 








|| अथ ध्यानम् || 


हस्तांभोज्युगस्थम कुम्भयुग्लादूदधृत्य तोयंशिरः । 

सिचन्तं करयोर्युगेन दधतं स्वांके संकुभैाकरौ || 

अक्षस्रगमृगहस्ताम्बुजगतं मूर्द्धस्थचन्द्रस्रवत्पीयूषेात्रतनुभजे सगिरिजं मृत्यून्जयं त्रयंम्बकम् ।।
चन्द्रोद्भाषितंमूर्द्धजंसुरपतिपीयूषपात्रंवहद्धस्ताब्जेनदधत्सुदिव्यममलं हास्यास्यपंड़्केरहम्।। 
सूर्येन्द्वग्निविलोचनं करतले पाशाक्षसूत्रांभोजं विभ्रतमक्षयं पशुपतिं मृत्युंजयं संस्मरेत।। 



---------------




अथ महामृत्युंजय मंत्र ||

ॐ ह्रों जूं सः त्र्यंबकम यजामहे सुगंधिम पुष्टिम बर्द्धनम
उर्वारुक मिव बंधनान मृत्योर्मुक्षीय मामृतात सः जूं ह्रों ॐ




महामृत्युंजय मन्त्र से कल्याणकारी शिव प्रसन्न होते हैं | धन सम्मान एवं ख्याति का विस्तार होता है, मृत्युतुल्य कष्ट, लंबी बीमारी एवं घरेलू समस्या से ग्रस्त होने पर महामृत्युंजय मन्त्र रामबाण सिद्ध होता है | जन्म कुंडली मे अगर मारकेश ग्रह बैठा हो या हाथ की आयु रेखा जगह जगह से कट रही हो या मिटी हुई हो तो यह जप अवश्य करें, जप की मात्रा सवा लाख होनी चाहिए |

कुण्डली मे मारकेश ग्रह बैठा होने का मुख्य पहचान है आपके मन मे बैचनी का अनुभव होना, किसी कार्य मे मन नहीं लगाना , दुर्घटना होते रहना, बीमारी से त्रस्त रहना, अपनों से मनमुटाव होना, शत्रुओं की संख्या मे निरंतर वृद्धि होना एवं कार्य पूरा होते होते रह जाना और समाज मे मान और सम्मान की कमी होना | यह मारकेश होने का लक्षण हैं जो प्रारम्भ मे दृष्टिगोचर होते हैं | जब मारकेश ग्रह की महादशा व्यतीत होने लगती है तो यह मृत्यु का कारण बन जाता है | इसलिए मारकेश ग्रह का समाधान करना जरूरी है । महामृत्युंजय मन्त्र का जप मारकेश ग्रह के प्रभाव से व्यक्ति को मुक्त करता है | धन बल और किर्ति सम्पन्न बनाता है | अतः जो व्यक्ति इन परेशानियों से पीड़ित है उन्हें महामृत्युंजय मन्त्र का जप अवश्य करना चाहिए |


------------------------------------




जप नियम: जप निर्धारित मात्रा मे तथा निर्धारित समय पर प्रतिदिन के हिसाब से होना चाहिए | जप के दौरान पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन, सात्विक भोजन, सत्य बचन, अहिंसा का पालन , वाणी नियंत्रण होना जरूरी है | अन्यथा यह जप पूर्ण फलदायी नहीं होता है |जप मे नियम बद्धता का होना ज्यादा जरूरी है नियम से किया हुआ जप ही पूर्ण फलदायी होता है | 



यह जप आप अपने घर व शिवालय में करें | शिवालय में यह जप विशेष फलदायी होता है क्योंकि वहाँ प्राण प्रतिष्ठित शिवलिंग होता है |

जप के समय ध्यान मे रखने वाली बातें :




  • जप उसी समय प्रारम्भ करना चाहिए जब शिव का निवास कैलाश पर्वत पर, गौरी के सान्निध्य हों या शिव बसहा पर आरूढ़ हों शिव का वास जब शमशान मे हो तो जप की शुरुआत नहीं करनी चाहिए। सही मुहूर्त के लिए आप हमसे अवश्य संपर्क करें यह आपको हमारे तरफ से बिना किसी लागत के उपलब्ध करवा दिया जायगा।
  • जप करते समय तर्जनी एवं कनिष्ठ अंगुली का स्पर्श माला के साथ नहीं होना चाहिए।
  • जप करते समय मुंह से आवाज नहीं निकालना चाहिए ।
  • जप के दौरान जम्हाई आने से वाये हाथ की उंगली से चुटकी बजाना चाहिए जिससे आपके अन्दर जमा हो रहे सात्विक प्रभाव जमा रहे
  • अपना पूर्ण ध्यान जप पर लगा होना चाहिए ।
  • जप के समय शिव का स्मरण सदैव करते रहना चाहिए ।
  • जप के पूर्ण होने पर हवन, दान एवं ब्राह्मण भोजन करवाना चाहिए।


कहा गया है " दुख मे सुमिरन सब करे दुख मे करे न कोई, जो सुख मे सुमिरन करे दुख कहे को होय । । " इस लिय अगर आप कोई समस्या से ग्रस्त नहीं हैं आप साधारण तौर से अपनी ज़िंदगी व्यतीत कर रहे हैं तब भी आप शिव के इस चमत्कारी मन्त्र का जप अवश्य करें। जिंदगी रूपी नदी सुख और दुख रूपी दो किनारों के बीच प्रवाहित होती है, अगर आप समय रहते शिव मन्त्र का जप करते रहेंगे तो आप सदैव प्रसन्न रहेंगे आपके घर वाले प्रसन्न चित्त रहेंगे, शत्रु से मुक्त रहेंगे, शिव कल्याण कारी हैं आपका भी कल्याण करेंगे। 


----------------


शिव की प्रसन्नता प्राप्ति हेतु कुछ अन्य सुगम मन्त्र 




ॐ ह्रों जूं सः । । इस शिव मन्त्र के नियमित 108 बार जप करने से शिव की कृपा वर्षा निरंतर होते रहती है। 

ॐ नमः शिवाय । । यह शिव मन्त्र सर्व विदित है 108 बार का प्रतिदिन जप आपको निरंतर प्रगति की ओर ले जाएगा। 


जब स्वयं मन्त्र का जप करने मे असमर्थ हैं तो यह जप आप किसी ब्राह्मण के द्वारा भी करवा सकते हैं |लेकिन यहाँ इस बात का ध्यान रखना होगा की जो ब्राह्मण आपने मन्त्र जप के लिए रखे हैं वे शाकाहारी हों ईमानदार हों अगर वे ईमानदार नहीं हुये तो संभावना है की संकल्पित मन्त्र का पूर्ण जप करने मे वे असमर्थ होंगे | साथ ही इस बात का ध्यान रखें कि वे इससे पहले किसी अन्य व्यक्ति का जप कर चुके हैं नहीं तो उनमे धैर्य की कमी होगी एवं प्रथम वार का समय उनको अनुभव प्राप्त करने में ही व्यर्थ चला जाएगा |जप शुरू करने से पूर्व अगर रुद्राभिषेक कर लिया जाए तो मन्त्र विशेष फलदायी हो जाता है इसलिए यह जरूरी हो जाता है की ब्राह्मण को वैदिक मंत्रों का समुचित ज्ञान हो | 


अगर आप किसी भी प्रकार के काल सर्प दोष से ग्रसित हैं या किसी मरकेश ग्रह की दशा आप पर व्यतीत हो रही है या आप निरंतर किसी न किसी समस्या से परेशान रहते हैं तो आप महामृत्युंजय मन्त्र का 125000 बार जप अवश्य करवाएँ । महामृत्युंजय मन्त्र का जप करवाने के लिए आप हमसे संपर्क करें। हमारे पास अनुभवी ब्राह्मण हैं जिनहोने अपने जीवन का अधिकांश भाग जप करने में व्यतीत कर दिया है जिससे वे महामृत्युंजय मन्त्र का जप करने के तरीके से भिज्ञ हैं  साथ ही वे वैदिक मंत्रों के भी ज्ञाता हैं | हम आपको पूर्ण विश्वास दिलाते हैं हमारे पंडितों से जप करवाने के बाद आपकी मनोकामना पूर्ण होगी। जप करवाने हेतु विशेष जानकारी के लिए आप निम्न बॉक्स मे अपने प्रश्न के साथ अपना मोबाइल नंबर अवश्य भेजें।




संपर्क - 092072 83275







सर्व मनोकामना पूर्ति के लिए शिवषडक्षरस्तोत्रम्


जय महाकाल 

 सर्व  मनोकामना पूर्ति के लिए   शिवषडक्षरस्तोत्रम्










भगवान शंकर की महिमा का वर्णन अनेक धर्मग्रंथों में किया गया है। सभी में एक ही बात कही गई है कि भगवान शिव अपने भक्तों का कल्याण करने के लिए तत्पर रहते हैं। यदि एक लौटा जल प्रतिदिन शिव पर जढ़ाया जाए तो भी भगवान शिव अपने भक्त से प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान शंकर की पूजा से सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति संभव है। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए यदि शिवषडक्षरस्तोत्र का नित्य जप किया जाए तो विशेष फल मिलता है- 





सर्व  मनोकामना पूर्ति के लिए   शिवषडक्षरस्तोत्रम्-



ऊँकारं बिंदुसंयुक्तं नित्यं ध्यायंति योगिन:।

कामदं मोक्षदं चैव ओंकाराय नमो नम:।।

नमंति ऋषयो देवा नमंत्यप्सरसां गणा:।

नरा नमंति देवेशं नकाराय नमो नम:।।

महादेवं महात्मानं महाध्यानं परायणम्।

महापापहरं देवं मकाराय नमो नम:।।

शिवं शान्तं जगन्नाथं लोकनुग्रहकारकम्।

शिवमेकपदं नित्यं शिकाराय नमो नम:।।

वाहनं वृषभो यस्य वासुकि: कंठभूषणम्।

वामे शक्तिधरं देवं वकाराय नमो नम:।।

यत्र यत्र स्थितो देव: सर्वव्यापी महेश्वर:।

यो गुरु: सर्वदेवानां यकाराय नमो नम:।।

षडक्षरमिदं स्तोत्रं य: पठेच्छिवसंनिधौ।

शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते।।



संपर्क - 092072 83275




शिव महिमा दरिद्रता-नाशक तथा धन-सम्पत्ति-दायक स्तोत्र

जय महाकाल 

दरिद्रता-नाशक तथा धन-सम्पत्ति-दायक स्तोत्र








शाण्डिल्य मुनि ने एक दरिद्र पुत्र की माता से कहा- ‘शिवजी की प्रदोषकाल के अन्तर्गत की गयी पूजा का फल श्रेष्ठ होता है। जो प्रदोषकाल में शिव की पूजा करते हैं, वे इसी जन्म में धन-धान्य, कुल-सम्पत्ति से समृद्ध हो जाते हैं। ब्राह्मणी ! तुम्हारा पुत्र पूर्व-जन्म में ब्राह्मण था। इसने अपना जीवन दान लेने में बिताया। इस कारण इस जन्म में इसे दारिद्रय मिला। अब उस दोष का निवारण करने के लिये इसे भगवान शंकर की शरण में जाना चाहिए।’
मुनि के यों कहने पर ब्राह्मणी ने निवेदन किया- ‘मुनिवर ! कृपया आप हमें शिव-पूजन की विधि बताइये।’
शाण्डिल्य मुनि बोले- ‘दोनों पक्षों की त्रयोदशी को मनुष्य मिराहार रहे और सूर्योदय से तीन घड़ी पूर्व स्नान कर ले। फिर श्वेत वस्त्र धारण करके धीर पुरुष संध्या और जप आदि मित्य कर्म की विधि पूरी करे। तदनन्तर मौन हो शास्त्रविधि का पालन करते हुए शिव की पूजा प्रारम्भ करे।
भगवन् विग्रह के आगे की भूमि को खूब लीप-पोतके शुद्ध करे। उस स्थल को धौतवस्त्र, फूल एवं पत्रों से खूब सजाये। इसके पश्चात् पवित्र भाव से शास्त्रोक्त मन्त्र-द्वारा देवपीठ को आमन्त्रित करे। इसके पश्चात् मातृकान्यासादि विधियों को पूर्ण करे। फिर हृदय में अनन्त आदि न्यास करके देवपीठ पर मन्त्र का न्यास करके हृदय में एक कमल की भावना करे।
वह कमल नौ शक्तियों से युक्त परम सुन्दर हो। उसी कमल की कर्णिका में कोटि-कोटि चन्द्रमा के समान प्रकाशमान भगवान् शिव का ध्यान करे।
भगवान् शिव के तीन नेत्र हैं। मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट शोभायमान है। जटाजूट कुछ-कुछ पीला हो रहा है। सर्पों के हार से उनकी शोभा बढ़ रही है। उनके कण्ठ में नीला चिह्न है। उमके हाथ में वरद तथा दूसरे हाथ में अभय-मुद्रा है। वे व्याघ्र-चर्म पहने रत्नमय सिंहासन पर विराजमान हैं। उनके वाम भाग में भगवती उमा का चिन्तन करे।
इस प्रकार युगल दम्पति का ध्यान करके उनकी मानसिक पूजा करे। इसके बाद सिंहासन पर स्थित महादेवजी का पूजन करे। पूजा के आरम्भ में एकाग्रचित्त हो संकल्प पढ़े। तदनन्तर हाथ जोड़कर मन-ही-मन उनका आह्वान करे-’ हे भगवान् शंकर ! आप ऋण, पातक, दुर्भाग्य आदि की निवृत्ति के लिये मुझ पर प्रसन्न हों।’ इसके पश्चात् गिरिजापति की प्रार्थना इस प्रकार करे-
जय देव जगन्नाथ, जय शंकर शाश्वत। जय सर्व-सुराध्यक्ष, जय सर्व-सुरार्चित ! ।।
जय सर्व-गुणातीत, जय सर्व-वर-प्रद ! जय नित्य-निराधार, जय विश्वम्भराव्यय ! ।।
जय विश्वैक-वेद्येश, जय नागेन्द्र-भूषण ! जय गौरी-पते शम्भो, जय चन्द्रार्ध-शेखर ! ।।
जय कोट्यर्क-संकाश, जयानन्त-गुणाश्रय ! जय रुद्र-विरुपाक्ष, जय चिन्त्य-निरञ्जन ! ।।
जय नाथ कृपा-सिन्धो, जय भक्तार्त्ति-भञ्जन ! जय दुस्तर-संसार-सागरोत्तारण-प्रभो ! ।।
प्रसीद मे महा-भाग, संसारार्त्तस्य खिद्यतः। सर्व-पाप-भयं हृत्वा, रक्ष मां परमेश्वर ! ।।
महा-दारिद्रय-मग्नस्य, महा-पाप-हृतस्य च। महा-शोक-विनष्टस्य, महा-रोगातुरस्य च।।
ऋणभार-परीत्तस्य, दह्यमानस्य कर्मभिः। ग्रहैः प्रपीड्यमानस्य, प्रसीद मम शंकर ! ।।
(स्क॰ पु॰ ब्रा॰ ब्रह्मो॰ ७।५९-६६)
फल-श्रुतिः
दारिद्रयः प्रार्थयेदेवं, पूजान्ते गिरिजा-पतिम्। अर्थाढ्यो वापि राजा वा, प्रार्थयेद् देवमीश्वरम्।।
दीर्घमायुः सदाऽऽरोग्यं, कोष-वृद्धिर्बलोन्नतिः। ममास्तु नित्यमानन्दः, प्रसादात् तव शंकर ! ।।
शत्रवः संक्षयं यान्तु, प्रसीदन्तु मम गुहाः। नश्यन्तु दस्यवः राष्ट्रे, जनाः सन्तुं निरापदाः।।
दुर्भिक्षमरि-सन्तापाः, शमं यान्तु मही-तले। सर्व-शस्य समृद्धिनां, भूयात् सुख-मया दिशः।।
अर्थात् ‘देव ! जगन्नाथ ! आपकी जय हो। सनातन शंकर ! आपकी जय हो। सम्पूर्ण देवताओं के अधीश्वर ! आपकी जय हो। सर्वदेवपूजित ! आपकी जय हो। सर्वगुणातीत ! आपकी जय हो। सबको वर प्रदान करने वाले प्रभो ! आपकी जय हो। नित्य, आधार-रहित, अविनाशी विश्वम्भर ! आपकी जय हो, जय हो। सम्पूर्ण विश्व के लिये एकमात्र जानने योग्य महेश्वर ! आपकी जय हो। नागराज वासुकी को आभूषण के रुप धारण करने वाले प्रभो ! आपकी जय हो। गौरीपते ! आपकी जय हो। चन्द्रार्द्धशेखर शम्भो ! आपकी जय हो। कोटी-सूर्यों के समान तेजस्वी शिव ! आपकी जय हो। अनन्त गुणों के आश्रय ! आपकी जय हो। भयंकर नेत्रों वाले रुद्र ! आपकी जय हो। अचिन्त्य ! निरञ्जन ! आपकी जय हो। नाथ ! दयासिन्धो ! आपकी जय हो। भक्तों की पीड़ा का नाश करने वाले प्रभो ! आपकी जय हो। दुस्तर संसारसागर से पार उतारने वाले परमेश्वर ! आपकी जय हो। महादेव, मैं संसार के दुःखों से पीड़ित एवं खिन्न हूँ, मुझ पर प्रसन्न होइये। परमेश्वर ! समस्त पापों के भय का अपहरण करके मेरी रक्षा कीजिये। मैं घोर दारिद्रय के समुद्र में डूबा हुआ हूँ। बड़े-बड़े पापों ने मुझे आक्रान्त कर लिया है। मैं महान् शोक से नष्ट और बड़े-बड़े रोगों से व्याकुल हूँ। सब ओर से ऋण के भार से लदा हुआ हूँ। पापकर्मों की आग में जल रहा हूँ और ग्रहों से पीड़ित हो रहा हूँ। शंकर ! मुझ पर प्रसन्न होइये।

(और कोई विधि-विधान न बन सके तो श्रद्धा-विश्वास-पूर्वक केवल उपर्युक्त स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करे।)


शिव के इस स्तोत्र से जगत का निश्चित ही कल्याण होगा ये सत्य वचन है ...हर हर महादेव ...! 



संपर्क - 092072 83275


श्री शिव भुजंगम स्तोत्रम –


श्री शिव  भुजंगम स्तोत्रम – 






श्री शिव  भुजंगम स्तोत्रम – 


गलद्दानगण्डं मिलद्भृङ्गषण्डं
चलच्चारुशुण्डं जगत्त्राणशौण्डम् ।
कनद्दन्तकाण्डं विपद्भङ्गचण्डं
शिवप्रॆमपिण्डं भजॆ वक्रतुण्डम् ॥ 1 ॥

अनाद्यन्तमाद्यं परं तत्त्वमर्थं
चिदाकारमॆकं तुरीयं त्वमॆयम् ।
हरिब्रह्ममृग्यं परब्रह्मरूपं
मनॊवागतीतं महःशैवमीडॆ ॥ 2 ॥

स्वशक्त्यादि शक्त्यन्त सिंहासनस्थं
मनॊहारि सर्वाङ्गरत्नॊरुभूषम् ।
जटाहीन्दुगङ्गास्थिशम्याकमौलिं
पराशक्तिमित्रं नमः पञ्चवक्त्रम् ॥ 3 ॥

शिवॆशानतत्पूरुषाघॊरवामादिभिः
पञ्चभिर्हृन्मुखैः षड्भिरङ्गैः ।
अनौपम्य षट्त्रिंशतं तत्त्वविद्यामतीतं
परं त्वां कथं वॆत्ति कॊ वा ॥ 4 ॥

प्रवालप्रवाहप्रभाशॊणमर्धं
मरुत्वन्मणि श्रीमहः श्याममर्धम् ।
गुणस्यूतमॆतद्वपुः शैवमन्तः
स्मरामि स्मरापत्तिसम्पत्तिहॆतॊः ॥ 5 ॥

स्वसॆवासमायातदॆवासुरॆन्द्रा
नमन्मौलिमन्दारमालाभिषिक्तम् ।
नमस्यामि शम्भॊ पदाम्भॊरुहं तॆ
भवाम्भॊधिपॊतं भवानी विभाव्यम् ॥ 6 ॥

जगन्नाथ मन्नाथ गौरीसनाथ
प्रपन्नानुकम्पिन्विपन्नार्तिहारिन् ।
महःस्तॊममूर्तॆ समस्तैकबन्धॊ
नमस्तॆ नमस्तॆ पुनस्तॆ नमॊ‌உस्तु ॥ 7 ॥

विरूपाक्ष विश्वॆश विश्वादिदॆव
त्रयी मूल शम्भॊ शिव त्र्यम्बक त्वम् ।
प्रसीद स्मर त्राहि पश्यावमुक्त्यै
क्षमां प्राप्नुहि त्र्यक्ष मां रक्ष मॊदात् ॥ 8 ॥

महादॆव दॆवॆश दॆवादिदॆव
स्मरारॆ पुरारॆ यमारॆ हरॆति ।
ब्रुवाणः स्मरिष्यामि भक्त्या
भवन्तं ततॊ मॆ दयाशील दॆव प्रसीद ॥ 9 ॥

त्वदन्यः शरण्यः प्रपन्नस्य नॆति
प्रसीद स्मरन्नॆव हन्यास्तु दैन्यम् ।
न चॆत्तॆ भवॆद्भक्तवात्सल्यहानिस्ततॊ
मॆ दयालॊ सदा सन्निधॆहि ॥ 10 ॥

अयं दानकालस्त्वहं दानपात्रं
भवानॆव दाता त्वदन्यं न याचॆ ।
भवद्भक्तिमॆव स्थिरां दॆहि मह्यं
कृपाशील शम्भॊ कृतार्थॊ‌உस्मि तस्मात् ॥ 11 ॥

पशुं वॆत्सि चॆन्मां तमॆवाधिरूढः
कलङ्कीति वा मूर्ध्नि धत्सॆ तमॆव ।
द्विजिह्वः पुनः सॊ‌உपि तॆ कण्ठभूषा
त्वदङ्गीकृताः शर्व सर्वॆ‌உपि धन्याः ॥ 12 ॥

न शक्नॊमि कर्तुं परद्रॊहलॆशं
कथं प्रीयसॆ त्वं न जानॆ गिरीश ।
तथाहि प्रसन्नॊ‌உसि कस्यापि
कान्तासुतद्रॊहिणॊ वा पितृद्रॊहिणॊ वा ॥ 13 ॥

स्तुतिं ध्यानमर्चां यथावद्विधातुं
भजन्नप्यजानन्महॆशावलम्बॆ ।
त्रसन्तं सुतं त्रातुमग्रॆ
मृकण्डॊर्यमप्राणनिर्वापणं त्वत्पदाब्जम् ॥ 14 ॥

शिरॊ दृष्टि हृद्रॊग शूल प्रमॆहज्वरार्शॊ जरायक्ष्महिक्काविषार्तान् ।
त्वमाद्यॊ भिषग्भॆषजं भस्म शम्भॊ
त्वमुल्लाघयास्मान्वपुर्लाघवाय ॥ 15 ॥

दरिद्रॊ‌உस्म्यभद्रॊ‌உस्मि भग्नॊ‌உस्मि दूयॆ
विषण्णॊ‌உस्मि सन्नॊ‌உस्मि खिन्नॊ‌உस्मि चाहम् ।
भवान्प्राणिनामन्तरात्मासि शम्भॊ
ममाधिं न वॆत्सि प्रभॊ रक्ष मां त्वम् ॥ 16 ॥

त्वदक्ष्णॊः कटाक्षः पतॆत्त्र्यक्ष यत्र
क्षणं क्ष्मा च लक्ष्मीः स्वयं तं वृणातॆ ।
किरीटस्फुरच्चामरच्छत्रमालाकलाचीगजक्षौमभूषाविशॆषैः ॥ 17 ॥

भवान्यै भवायापि मात्रॆ च पित्रॆ
मृडान्यै मृडायाप्यघघ्न्यै मखघ्नॆ ।
शिवाङ्ग्यै शिवाङ्गाय कुर्मः शिवायै
शिवायाम्बिकायै नमस्त्र्यम्बकाय ॥ 18 ॥

भवद्गौरवं मल्लघुत्वं विदित्वा
प्रभॊ रक्ष कारुण्यदृष्ट्यानुगं माम् ।
शिवात्मानुभावस्तुतावक्षमॊ‌உहं
स्वशक्त्या कृतं मॆ‌உपराधं क्षमस्व ॥ 19 ॥

यदा कर्णरन्ध्रं व्रजॆत्कालवाहद्विषत्कण्ठघण्टा घणात्कारनादः ।
वृषाधीशमारुह्य दॆवौपवाह्यन्तदा
वत्स मा भीरिति प्रीणय त्वम् ॥ 20 ॥

यदा दारुणाभाषणा भीषणा मॆ
भविष्यन्त्युपान्तॆ कृतान्तस्य दूताः ।
तदा मन्मनस्त्वत्पदाम्भॊरुहस्थं
कथं निश्चलं स्यान्नमस्तॆ‌உस्तु शम्भॊ ॥ 21 ॥

यदा दुर्निवारव्यथॊ‌உहं शयानॊ
लुठन्निःश्वसन्निःसृताव्यक्तवाणिः ।
तदा जह्नुकन्याजलालङ्कृतं तॆ
जटामण्डलं मन्मनॊमन्दिरॆ स्यात् ॥ 22 ॥

यदा पुत्रमित्रादयॊ मत्सकाशॆ
रुदन्त्यस्य हा कीदृशीयं दशॆति ।
तदा दॆवदॆवॆश गौरीश शम्भॊ
नमस्तॆ शिवायॆत्यजस्रं ब्रवाणि ॥ 23 ॥

यदा पश्यतां मामसौ वॆत्ति
नास्मानयं श्वास ऎवॆति वाचॊ भवॆयुः ।
तदा भूतिभूषं भुजङ्गावनद्धं
पुरारॆ भवन्तं स्फुटं भावयॆयम् ॥ 24 ॥

यदा यातनादॆहसन्दॆहवाही
भवॆदात्मदॆहॆ न मॊहॊ महान्मॆ ।
तदा काशशीतांशुसङ्काशमीश
स्मरारॆ वपुस्तॆ नमस्तॆ स्मरामि ॥ 25 ॥

यदापारमच्छायमस्थानमद्भिर्जनैर्वा विहीनं गमिष्यामि मार्गम् ।
तदा तं निरुन्धङ्कृतान्तस्य मार्गं
महादॆव मह्यं मनॊज्ञं प्रयच्छ ॥ 26 ॥

यदा रौरवादि स्मरन्नॆव भीत्या
व्रजाम्यत्र मॊहं महादॆव घॊरम् ।
तदा मामहॊ नाथ कस्तारयिष्यत्यनाथं पराधीनमर्धॆन्दुमौलॆ ॥ 27 ॥

यदा श्वॆतपत्रायतालङ्घ्यशक्तॆः
कृतान्ताद्भयं भक्तिवात्सल्यभावात् ।
तदा पाहि मां पार्वतीवल्लभान्यं
न पश्यामि पातारमॆतादृशं मॆ ॥ 28 ॥

इदानीमिदानीं मृतिर्मॆ भवित्रीत्यहॊ सन्ततं चिन्तया पीडितॊ‌உस्मि ।
कथं नाम मा भून्मृतौ भीतिरॆषा
नमस्तॆ गतीनां गतॆ नीलकण्ठ ॥ 29 ॥

अमर्यादमॆवाहमाबालवृद्धं
हरन्तं कृतान्तं समीक्ष्यास्मि भीतः ।
मृतौ तावकाङ्घ्र्यब्जदिव्यप्रसादाद्भवानीपतॆ निर्भयॊ‌உहं भवानि ॥ 30 ॥

जराजन्मगर्भाधिवासादिदुःखान्यसह्यानि जह्यां जगन्नाथ दॆव ।
भवन्तं विना मॆ गतिर्नैव शम्भॊ
दयालॊ न जागर्ति किं वा दया तॆ ॥ 31 ॥

शिवायॆति शब्दॊ नमःपूर्व ऎष
स्मरन्मुक्तिकृन्मृत्युहा तत्त्ववाची ।
महॆशान मा गान्मनस्तॊ वचस्तः
सदा मह्यमॆतत्प्रदानं प्रयच्छ ॥ 32 ॥

त्वमप्यम्ब मां पश्य शीतांशुमौलिप्रियॆ भॆषजं त्वं भवव्याधिशान्तौ
बहुक्लॆशभाजं पदाम्भॊजपॊतॆ
भवाब्धौ निमग्नं नयस्वाद्य पारम् ॥ 33 ॥

अनुद्यल्ललाटाक्षि वह्नि प्ररॊहैरवामस्फुरच्चारुवामॊरुशॊभैः ।
अनङ्गभ्रमद्भॊगिभूषाविशॆषैरचन्द्रार्धचूडैरलं दैवतैर्नः ॥ 34 ॥

अकण्ठॆकलङ्कादनङ्गॆभुजङ्गादपाणौकपालादफालॆ‌உनलाक्षात् ।
अमौलौशशाङ्कादवामॆकलत्रादहं दॆवमन्यं न मन्यॆ न मन्यॆ ॥ 35 ॥

महादॆव शम्भॊ गिरीश त्रिशूलिंस्त्वदीयं समस्तं विभातीति यस्मात् ।
शिवादन्यथा दैवतं नाभिजानॆ
शिवॊ‌உहं शिवॊ‌உहं शिवॊ‌உहं शिवॊ‌உहम् ॥ 36 ॥

यतॊ‌உजायतॆदं प्रपञ्चं विचित्रं
स्थितिं याति यस्मिन्यदॆकान्तमन्तॆ ।
स कर्मादिहीनः स्वयञ्ज्यॊतिरात्मा
शिवॊ‌உहं शिवॊ‌உहं शिवॊ‌உहं शिवॊ‌உहम् ॥ 37 ॥

किरीटॆ निशॆशॊ ललाटॆ हुताशॊ
भुजॆ भॊगिराजॊ गलॆ कालिमा च ।
तनौ कामिनी यस्य तत्तुल्यदॆवं
न जानॆ न जानॆ न जानॆ न जानॆ ॥ 38 ॥

अनॆन स्तवॆनादरादम्बिकॆशं
परां भक्तिमासाद्य यं यॆ नमन्ति ।
मृतौ निर्भयास्तॆ जनास्तं भजन्तॆ
हृदम्भॊजमध्यॆ सदासीनमीशम् ॥ 39 ॥

भुजङ्गप्रियाकल्प शम्भॊ मयैवं
भुजङ्गप्रयातॆन वृत्तॆन क्लृप्तम् ।
नरः स्तॊत्रमॆतत्पठित्वॊरुभक्त्या
सुपुत्रायुरारॊग्यमैश्वर्यमॆति ॥ 40 ॥



संपर्क - 092072 83275




शिव ताण्डव स्तोत्र की महिमा

जय जय महाकाल 




 शिव ताण्डव स्तोत्र की महिमा 

 




 - यह स्तोत्र आपका जीवन बदल देगा -

रावण रचित शिव तांडव स्तोत्र



॥ अथ रावण कृत  शिव तांडव स्तोत्र ॥

जटाटवीग लज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌। 

डमड्डमड्डमड्डम न्निनादवड्डमर्वयं
चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥1॥



जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी ।
विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।

धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके
किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥


धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर-
स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे ।

कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि
कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥


जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।

मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥4॥


सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर-
प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।

भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः
श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥5॥


ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा-
निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम्‌ ।

सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं
महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥6॥



कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।

धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥7॥


नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर-
त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः ।

निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः
कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥



प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा-
विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌

स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥



अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी-
रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌ ।

स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं
गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥


जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर-
द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्-

धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥



दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो-
र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।

तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥12॥


कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्‌
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌ ।

विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥13॥


निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।

तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥


प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।

विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥15॥


इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं
पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌ ।

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं
विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ॥16॥


पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं
यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।

तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां
लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥





शिव पूजा के अंत में इस रावणकृत शिव तांडव स्तोत्र का प्रदोष समय में गान करने से या पढ़ने से लक्ष्मी स्थिर रहती है। रथ गज-घोड़े से सर्वदा युक्त रहता है।




॥ इति शिव तांडव स्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥

 
 ----------------------------------------------------------------------------------


हर किसी के मन में एक ख्याल हमेशा आता है कि क्या कोई ऐसा मंत्र है जो आपको सारा वैभव और सिद्धियां दे सकता है। मंत्रों में बड़ी शक्ति होती है, एक मंत्र का सही जाप आपकी जिंदगी बदल सकता है। ऐसा ही एक स्तोत्र है शिवतांडव स्तोत्र, जिसके जरिए आप न केवल धन-संपत्ति पा सकते हैं बल्कि आपका व्यक्तित्व भी निखर जाएगा। शिव तांडव स्तोत्र रावण द्वारा रचा गया है, इसकी कठिन शब्दावली और अद्वितीय वाक्य रचना इसे अन्य मंत्रों से अलग बनाती है। आपके जीवन में किसी भी सिद्धि की महत्वाकांक्षा हो इस स्तोत्र के जाप से आपको आसानी से प्राप्त हो जाएगी। सबसे ज्यादा फायदा आपकी वाक सिद्धि को होगा, अगर अभी तक आप दोस्तों में या किसी ग्रुप में बोलते हुए अटकते हैं तो यह समस्या इस स्तोत्र के पाठ से दूर हो जाएगी। इसकी शब्द रचना के कारण व्यक्ति का उच्चरण साफ हो जाता है। दूसरा इस मंत्र से नृत्य, चित्रकला, लेखन, युद्धकला, समाधि, ध्यान आदि कार्यो में भी सिद्धि मिलती है। इस स्तोत्र का जो भी नित्य पाठ करता है उसके लिए सारे राजसी वैभव और अक्षय लक्ष्मी भी सुलभ होती है।



शिव ताण्डव स्तोत्र ( संस्कृत:शिवताण्डवस्तोत्रम् ) महान विद्वान एवं परम शिवभक्त लंकाधिपति रावण द्वारा विरचित भगवान शिव का स्तोत्र है। मान्यता है कि रावण ने कैलाश पर्वत ही उठा लिया था और जब पूरे पर्वत को ही लंका ले चलने को उद्यत हुआ तो भोले बाबा ने अपने अंगूठे से तनिक सा जो दबाया तो कैलाश फिर जहां था वहीं अवस्थित हो गया। शिव के अनन्य भक्त रावण का हाथ दब गया और वह आर्तनाद कर उठा - "शंकर शंकर" - अर्थात क्षमा करिए, क्षमा करिए और स्तुति करने लग गया; जो कालांतर में शिव तांडव स्त्रोत्र कहलाया।



काव्य शैली


शिवताण्डव स्तोत्र स्तोत्रकाव्य में अत्यन्त लोकप्रिय है। यह पञ्चचामर छन्द में आबद्ध है। इसकी अनुप्रास और समास बहुल भाषा संगीतमय ध्वनि और प्रवाह के कारण शिवभक्तों में प्रचलित है। सुन्दर भाषा एवं काव्य-शैली के कारण यह स्तोत्रों विशेषकर शिवस्तोत्रों में विशिष्ट स्थान रखता है।




संपर्क - 09207 283275






शिव तंत्र ज्ञान

   








शिव तंत्र ज्ञान

 ॥ॐ॥ जो लोक-लज्जा, शास्त्र-लाज्जा,कुल-लज्जा आदि पाश में बंधा है, वह जिव है,और जो सब प्रकार की लज्जा को छोड़कर तंत्र-मार्ग पर चलकर उन्मुक्त साधना की तृप्ति करे वही शिव होता है ॥ॐ॥

शिव रुद्राष्टकम shiv Rudrashtakm


- जय महाकाल - 

शिव रुद्राष्टकम Shiv Rudrashtakm

 

 - शिव रुद्राष्टकम


 नमामीश मीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवॆद स्वरुपं  
   निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चदाकाश माकाशवासं भजॆहम् 

   निराकार मॊङ्कार मूलं तुरीयं गिरिज्ञान गॊतीत मीशं गिरीशम् ।
करालं महाकालकालं कृपालं गुणागार संसारसारं नतॊ हम् ॥


तुषाराद्रि सङ्काश गौरं गम्भीरं मनॊभूतकॊटि प्रभा श्रीशरीरम् ।
स्फुरन्मौलिकल्लॊलिनी चारुगाङ्गं लस्त्फालबालॆन्दु भूषं महॆशम् ॥


चलत्कुण्डलं भ्रू सुनॆत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालुम् ।
मृगाधीश चर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि ॥


प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परॆशम् अखण्डम् अजं भानुकॊटि प्रकाशम् ।
त्रयी शूल निर्मूलनं शूलपाणिं भजॆहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥


कलातीत कल्याण कल्पान्तरी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ।
चिदानन्द सन्दॊह मॊहापकारी प्रसीद प्रसीद प्रभॊ मन्मधारी ॥


न यावद् उमानाथ पादारविन्दं भजन्तीह लॊकॆ परॆ वा नाराणाम् ।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभॊ सर्वभूताधिवास ॥


नजानामि यॊगं जपं नैव पूजां नतॊ हं सदा सर्वदा दॆव तुभ्यम् ।
जराजन्म दुःखौघतातप्यमानं प्रभॊपाहि अपन्नमीश प्रसीद! ॥


रुद्राष्टकमिदंम फरोक्त विप्रेण हरातोषये
ये पठंति भक्त्या तेषाम शंभू: प्रसीदती ॥

विधि 

   नित्य सुबह शाम पूजन के समय यथा शक्ति उपचार पूजन से शिव की आराधना के ध्यान कर के इस रुद्राष्टकम का नित्य ११ पाठ करे कुछ ही महीनो में शिव की कृपा का अनुभव होने लगेगा मगर चित्त निर्मल और कर्म सत्य होने आवश्यक हैं 

  ॥ ईति श्री गोस्वामि तुलसीदास कृतं श्री रुद्राष्टकम संपूर्णम ॥


गुरूजी - + 91 9207283275