हनुमान दोष निवारण मंत्र साधना ग्रह दोष, रोग और संकट से तुरंत मुक्ति का अचूक उपाय

 

हनुमान दोष निवारण मंत्र साधना  

ग्रह दोष, रोग और संकट से तुरंत मुक्ति का अचूक उपाय –

 (विशेष तांत्रिक विधि सहित)


जय महाकाल !
भगवान हनुमान अद्भुत शक्ति, अटूट भक्ति और असीम पराक्रम के प्रतीक माने जाते हैं। वे केवल रामभक्त ही नहीं, बल्कि तांत्रिक साधनाओं में भी अत्यंत प्रभावशाली देवता माने गए हैं। उनकी साधना से साधक को साहस, रक्षा और अदृश्य शक्तियों पर नियंत्रण की क्षमता प्राप्त होती है। हनुमानजी को रुद्रावतार कहा जाता है, इसलिए वे शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों के सभी कष्ट दूर कर देते हैं। उनकी कृपा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं और जीवन में आने वाली हर बाधा समाप्त होने लगती है।

हनुमान दोष निवारण मंत्र साधना

मंत्र:
ॐ उत्तरमुखाय आदि वराहाय लं लं लं लं लं सी हं सी हं नील-कण्ठ-मूर्तये लक्ष्मणप्राणदात्रे वीरहनुमते लंकोपदहनाय सकल सम्पत्ति-कराय पुत्र-पौत्रद्यभीष्ट-कराय ॐ नमः स्वाहा ।”

 साधक मित्रों, सनातन परंपरा में भगवान हनुमान को अत्यंत शक्तिशाली, शीघ्र प्रसन्न होने वाले तथा भक्तों के कष्ट हरने वाले देवता माना गया है। वे केवल भक्ति के ही नहीं, बल्कि तांत्रिक साधनाओं में भी विशेष स्थान रखते हैं। यही कारण है कि उन्हें रुद्रावतार तथा उग्र देवता भी कहा जाता है।
हनुमानजी अपने सच्चे भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण करने में समर्थ हैं। चाहे वह रोग, शत्रु, भय, ग्रहदोष या जीवन में आने वाली किसी भी प्रकार की बाधा क्यों न हो—हनुमान साधना के माध्यम से इन सभी का निवारण संभव माना गया है।
आज हम जिस विशेष मंत्र की बात कर रहे हैं, वह दोष निवारण, महामारी से रक्षा, अमंगल शांति तथा ग्रह बाधा दूर करने के लिए अत्यंत प्रभावी माना जाता है। यह साधना यदि पूर्ण श्रद्धा, नियम और शुद्धता के साथ की जाए, तो साधक को अद्भुत अनुभव प्राप्त हो सकते हैं।

साधना का महत्व:–
यह मंत्र केवल सामान्य जप नहीं है, बल्कि एक तांत्रिक शक्ति से युक्त साधना है। इसमें हनुमानजी के उस रूप का आह्वान किया जाता है जो संकटों का नाश करने वाला, रक्षक तथा कल्याणकारी है।
इस साधना के माध्यम से साधक न केवल अपने जीवन के दोषों को दूर कर सकता है, बल्कि आत्मबल, साहस और सकारात्मक ऊर्जा भी प्राप्त करता है। यह साधना विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी है जो बार-बार असफलता, रोग, भय या मानसिक अशांति का सामना कर रहे हैं।

साधना की विधि– (विधि-विधान)
इस साधना को करने के लिए कुछ विशेष नियमों का पालन करना आवश्यक है।

स्थान का चयन:–
साधना के लिए स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इसे किसी शांत, पवित्र और एकांत स्थान पर करें।
मंदिर नदी किनारा पर्वत स्थित मंदिर या घर में कोई एकांत कक्ष स्थान पूर्णतः स्वच्छ और पवित्र होना चाहिए।

समय:–
इस मंत्र का जप रात्रि के समय करना अधिक प्रभावी माना जाता है, विशेषकर मध्य रात्रि के आसपास।

आसन और वस्त्र:–
लाल या काले रंग का आसन उपयोग करें वस्त्र स्वच्छ और हल्के रंग के हों
साधना के समय मन और शरीर दोनों शुद्ध होने चाहिए

दीप और धूप:–
देसी घी का दीपक जलाएं गुग्गुल या लोबान की धूप करें
इससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है।

मंत्र जप विधि:–
रुद्राक्ष की माला का उपयोग करें प्रतिदिन कम से कम १०८ बार मंत्र जप करें
जप के समय मन को पूर्णतः एकाग्र रखें

अवधि:–
इस साधना को लगातार २१ या ३१ दिनों तक करना श्रेष्ठ माना जाता है।
साधना के दौरान ध्यान रखने योग्य बातें
साधना के समय ब्रह्मचर्य का पालन करें
मांस, मदिरा और तामसिक भोजन से दूर रहें
किसी से अनावश्यक वार्तालाप न करें
मन में किसी के प्रति द्वेष या नकारात्मक भावना न रखें

साधना के संभावित अनुभव:–
इस साधना के दौरान साधक को विभिन्न प्रकार के आध्यात्मिक अनुभव हो सकते हैं, जैसे—
स्वप्न में संकेत मिलना अचानक मानसिक शांति का अनुभव भय का समाप्त होना
सकारात्मक ऊर्जा का संचार
कुछ साधकों को हनुमानजी की उपस्थिति का आभास भी हो सकता है, लेकिन इन अनुभवों से विचलित न होकर साधना में निरंतरता बनाए रखें। साधना के लाभ ग्रह दोषों का निवारण रोग और महामारी से रक्षा
शत्रु बाधा समाप्त आर्थिक स्थिति में सुधार संतान एवं परिवार की उन्नति मानसिक शांति और आत्मबल में वृद्धि

विशेष सूचना (अत्यंत महत्वपूर्ण)
यह मंत्र अत्यंत प्रभावशाली और तांत्रिक स्वरूप का है। इसलिए इसे बिना किसी योग्य गुरु की अनुमति के करना उचित नहीं होगा। यदि कोई व्यक्ति इस साधना को बिना गुरु मार्गदर्शन के करता है, तो उसे मानसिक या परिस्थितिजन्य कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। अतः सदैव किसी अनुभवी गुरु के निर्देशन में ही इस साधना को प्रारंभ करें। साथ ही, इस प्रकार की गूढ़ साधनाओं का सम्मान करें और इन्हें केवल ज्ञान एवं साधना के उद्देश्य से ही अपनाएं।

हनुमानजी की कृपा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। यदि सच्चे मन, श्रद्धा और नियमपूर्वक इस मंत्र साधना को किया जाए, तो जीवन के अनेक दोष और कष्ट स्वतः दूर हो सकते हैं। साधना का मूल मंत्र है श्रद्धा, विश्वास और निरंतरता। यदि ये तीनों आपके पास हैं, तो सफलता निश्चित है।
जय बजरंगबली! 🔱




( विशेष सुचना ) - मंत्र को बिना गुरु  अनुमति के करने पर आकस्मिक संकटों का सामना करना पड सकता हैं , मंत्र को ब्लॉग से चोरी कर के कॉपी पेस्ट करनेवाला  वाला जो भी होगा दण्डित अवश्य होगा  ...


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शीतला अष्टमी पूजा विधि – बसोड़ा क्यों मनाया जाता है, व्रत कथा और माता शीतला मंत्र

 

जय महाकाल 


                                             – शीतला अष्टमी तांत्रिक पूजा विधि–माता शीतला मंत्र–

शीतला अष्टमी पूजा विधि – बसोड़ा क्यों मनाया जाता है, व्रत कथा और माता शीतला मंत्र तथा तांत्रिक महत्व

शीतला अष्टमी हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण और पवित्र व्रत भी हैं और साधना भी है। यह पर्व माता शीतला को समर्पित होता है, जिन्हें रोगों से रक्षा करने वाली देवी कहते  है। मान्यता है कि माता शीतला की कृपा से चेचक, बुखार, त्वचा रोग और अन्य प्रकार की बीमारियों से मुक्ति मिलती है। शीतला अष्टमी का व्रत विशेष रूप से होली के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भक्तगण और साधक श्रद्धा और विश्वास के साथ माता शीतला की पूजा करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि तथा रोगमुक्ति की कामना करते हैं।

शीतला अष्टमी पूजा में माता शीतला का चित्र

– शीतला अष्टमी का महत्व–

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता शीतला शीतलता और स्वास्थ्य की देवी हैं। प्राचीन समय में जब चिकित्सा सुविधाएं कम थीं, तब लोग देवी शीतला की पूजा कर रोगों से रक्षा की प्रार्थना करते थे। आज भी कई स्थानों पर यह परंपरा बड़ी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। माना जाता है कि जो भक्त सच्चे मन से माता शीतला की पूजा करता है, उसके घर में रोग-दोष नहीं टिकते और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

बसोड़ा क्यों मनाया जाता है – शीतला अष्टमी के साथ “बसोड़ा” की परंपरा भी जुड़ी हुई है। बसोड़ा का अर्थ है “बासी भोजन”। इस दिन घरों में एक दिन पहले बना हुआ ठंडा भोजन माता शीतला को भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि माता शीतला को ठंडा और शीतल भोजन प्रिय है, इसलिए इस दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता।

बसोड़ा के दिन लोग पूरी, पकौड़ी, मीठे चावल, हलवा, दही और अन्य पकवान एक दिन पहले ही बनाकर रख लेते हैं। अगले दिन वही भोजन माता शीतला को अर्पित किया जाता है और प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। यह परंपरा हमें संयम, श्रद्धा और प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने का संदेश देती है।

–शीतला अष्टमी पूजा विधि–

शीतला अष्टमी के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद पूजा स्थान को साफ करके माता शीतला की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। पूजा में जल, अक्षत, रोली, फूल, धूप, दीप और बासी भोजन का भोग अर्पित किया जाता है।

पूजा करते समय माता शीतला का ध्यान करते हुए प्रार्थना करें कि वे आपके परिवार को रोगों और संकटों से बचाएं। इसके बाद शीतला माता की व्रत कथा का पाठ करें और अंत में आरती करके प्रसाद वितरण करें। इस दिन शांत मन से माता का स्मरण करना विशेष फलदायी माना जाता है।

*शीतला माता व्रत कथा*

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार एक नगर में शीतला अष्टमी का पर्व आया। नगर की अधिकांश महिलाओं ने माता शीतला का व्रत रखा और बसोड़ा का पालन किया, लेकिन एक स्त्री ने इस परंपरा को महत्व नहीं दिया और उस दिन भी घर में चूल्हा जला दिया। कुछ ही समय बाद उसके परिवार में रोग फैलने लगे।जब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ, तब उसने सच्चे मन से माता शीतला की पूजा की और व्रत का पालन किया। माता की कृपा से उसके परिवार के सभी सदस्य स्वस्थ हो गए। तभी से यह मान्यता प्रचलित हुई कि शीतला अष्टमी के दिन चूल्हा नहीं जलाना चाहिए और माता की श्रद्धा से पूजा करनी चाहिए।

– शीतला माता का मंत्र –

 – पूजा के समय माता शीतला का यह सरल मंत्र जपना शुभ माना जाता है—

ॐ ह्रिम श्रीं शीतलायै नमः।

इस मंत्र का श्रद्धा और विश्वास के साथ जप करने से मन को शांति मिलती है और देवी की कृपा प्राप्त होती है। कुछ भक्त माता शीतला के बीज मंत्र और स्तोत्र का भी पाठ करते हैं।


– शीतला माता का तांत्रिक महत्व –

तांत्रिक परंपरा में भी माता शीतला का विशेष महत्व माना गया है। कुछ साधक माता को रोग-निवारण और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा करने वाली शक्ति के रूप में पूजते हैं। तांत्रिक साधना में देवी का ध्यान कर विशेष मंत्रों का जप किया जाता है, जिससे साधक मानसिक शक्ति और आत्मविश्वास प्राप्त करता है।

*वैसे माता शीतला के तांत्रिक मंत्र अति तीव्र होते हैं उन्हें गुप्त रखा गया हैं उन्हें गुरु परंपरा से ग्रहण करना चाहिए*

हालाँकि ऐसी साधनाएं गुरु के मार्गदर्शन में ही करनी चाहिए। सामान्य भक्तों के लिए माता शीतला की भक्ति, पूजा और मंत्र जप ही सबसे सरल और सुरक्षित मार्ग माना जाता है।

– फलश्रुति –

शीतला अष्टमी केवल एक धार्मिक विधि पर्व ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छता और श्रद्धा का विशेष आध्यात्मिक कर्म भी है। यह पर्व हमें सिखाता है कि देवी-देवताओं की पूजा के साथ-साथ हमें अपने जीवन में अनुशासन और विश्वास बनाए रखना चाहिए। सच्चे मन से माता शीतला की पूजा करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और रोग-दोष क्लेश दूर होते हैं।

माता शीतला सभी भक्तों पर साधकों पर अपनी कृपा बनाए रखें और सभी को स्वस्थ एवं सुखी जीवन का आशीर्वाद दें।यही कामना करते हैं¡

||जय महाकाल||


गुरुजी : - 91 9207283275




पति वशीकरण होली पर किया जाने वाला वशीकरण मंत्र टोटका उपाय विधि

 

जय महाकाल साधक मित्रों 


* पति वशीकरण होली पर किया जाने वाला वशीकरण मंत्र टोटका उपाय विधि * 


जय महाकाल साधक मित्रों ! आज एक होली पर किए जाने वाला विशेष पति वशीकरण उपाय एवं मंत्र टोटका बताने जा रहा हूँ, जो कुछ महिलाएं अपने पति के प्रेम से वंचित हैं , या पति प्रेम नहीं करता, या किसी दूसरी स्त्री के ओर आकर्षित रहते हैं, उनके जीवन की अंधेरी रात को इस उपाय टोटके मंत्र से  हमेशा के लिए खत्म कर सकती है। क्यों अपने पति को अपना नहीं बना पा रहे? वह आपके सामने होते हुए भी आपको क्यों नजरअंदाज करता है? 

आज  महिलाओं के इसी समस्या के चलते मैं आपको एक विशेष प्रयोग टोटका मंत्र बताऊंगा जो बाहोंत दुर्लभ हैं । जो मैं आपको वह गुप्त रहस्य बताऊँगा जिसे प्राचीन काल से ऋषि-मुनि प्रयोग करते आए हैं। आपको केवल सुबह उठकर, बिना मुँह धोए, एक छोटा सा उपाय करना है। फिर देखिए, जिसे आप पसंद करते हैं – , पति-या मित्र हो या कोई भी प्रिय व्यक्ति – वह आपके प्रति आकर्षित होने लगेगा।

दोस्तों, यह कोई साधारण टोटका नहीं है। यह आपके मन की ऊर्जा को दूसरे के मन तक पहुँचाने की एक क्रिया है। इसे करने के लिए आपको किसी पंडित के पास जाने की जरूरत नहीं है, न ही श्मशान जाने की आवश्यकता है। आप अपने घर में, अपने कमरे में बैठकर यह क्रिया कर सकते हैं।

यह उपाय किसी भी धर्म के व्यक्ति के लिए समान रूप से काम करता है, क्योंकि प्रेम किसी धर्म की सीमा नहीं मानता।

आवश्यक सामग्री:

इस क्रिया के लिए आपको केवल तीन चीजों की आवश्यकता होगी:

बरगद (बट) के पेड़ के दो ताजे पत्ते

– पत्ते साफ और बिना फटे होने चाहिए।

– जमीन पर गिरे हुए पत्ते का उपयोग न करें।

– पेड़ से तोड़ते समय मन ही मन अनुमति अवश्य लें।

लाल मार्कर पेन या लाल स्याही का पेन का उपयोग करे

– लाल रंग प्रेम और आकर्षण का प्रतीक है।

– काली या नीली स्याही का प्रयोग न करें।

एक हाथ लंबा लाल सूती धागा

– नायलॉन सिंथेटिक धागा न लें।

कब करें?

सप्ताह के किसी भी दिन कर सकते हैं, लेकिन शुक्रवार को करना सबसे उत्तम माना गया है।

समय – सुबह 6 बजे से 9 बजे के बीच, सूर्योदय के बाद।

विधि:

शुक्रवार सुबह तय समय पर उठें।

किसी से बात न करें, कुल्ला  दंत मंजन न करें, पानी भी न पिएं।

पूर्व दिशा की ओर मुख करके शांत स्थान पर बैठें।

अपनी इष्ट देवी-देवता पितृ को याद करें।

अब पहला बरगद का पत्ता लें और जिस व्यक्ति को पाना चाहते हैं उसका नाम उस पर लाल पेन से साफ-साफ लिखें।

दूसरे पत्ते पर पहले अपना नाम लिखें और उसके नीचे यह बीज मंत्र लिखें:

“ॐ क्लीं क्लीं वशीभूताय स्वाहा”

इसके बाद दोनों पत्तों को इस प्रकार मिलाएँ कि दोनों नाम एक-दूसरे की ओर हों। फिर उन्हें चार बार मोड़ लें। अब लाल धागे से पत्तों को ठीक सात बार लपेटें और सात गाँठें लगाएँ। हर गाँठ लगाते समय मन ही मन कहें: “अब तुम मेरे हो चुके हो।”

अब उस बंधे हुए पत्ते को हाथ में लेकर आँखें बंद करें और ऊपर लिखा मंत्र 51 बार जपें।जप पूरा होने पर पत्ते पर तीन बार फूँक मारें। उसी दिन सुबह किसी नदी, तालाब या बहते हुए जल या नदी स्रोत के पास जाएँ।

पत्ते को जल में प्रवाहित करने से पहले उस व्यक्ति का नाम 11 बार लें।

फिर पत्ते को पानी में छोड़ दें और पीछे मुड़कर न देखें। आप देखेंगे २ से 3 दिन में आपको अनुभव होने लगेगा 

{साधक मित्रों यह प्रयोग एक जानकारी के उद्देश्य से दिया जा रहा है, कृपया इसका दूर उपयोग ना करे , अगर कोई करता है उसके स्वयं के हानि का जिम्मेदार खुद होगा }

कोई भी साधना सिद्धि प्रयोग अनुभवी गुरु के निर्देश में करे इससे सफलता शीघ्र प्राप्त होती हैं

– जय महाकाल –

गुरुजी –91  9207283275

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होलिका पूर्णिमा पर शत्रु शांति हेतु शक्तिशाली अघोर तांत्रिक प्रयोग–


 |जय महाकाल |


होलिका पूर्णिमा पर शत्रु शांति हेतु शक्तिशाली तांत्रिक प्रयोग | Holika Purnima Tantra Prayog


जय महाकाल साधक मित्रों|होलिका पूर्णिमा की पावन रात्रि को तांत्रिक परंपरा में विशेष सिद्धि-काल माना गया है। यह वह समय है जब अग्नि तत्व सक्रिय होता है और साधना के द्वारा सूक्ष्म अवरोधों को शांति में परिवर्तित करने का प्रयास किया जाता है। आज मैं एक ऐसे प्रयोग की चर्चा कर रहा हूँ, जिसका उद्देश्य किसी को हानि पहुँचाना नहीं, बल्कि अपने जीवन में उत्पात मचाने वाले शत्रु-वृत्ति और विरोधात्मक ऊर्जा को शांत करना है।

सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि “शत्रु संहार” का वास्तविक तात्पर्य व्यक्ति का नाश नहीं, बल्कि शत्रुता का अंत है। साधक का मार्ग सदैव धर्म और मर्यादा से बंधा होता है। यदि कोई व्यक्ति निरंतर आपके जीवन शैली को ठेस पहुँचा रहा हो, आपके कार्यों में बाधाएँ उत्पन्न कर रहा हो या मानसिक अशांति का कारण बन रहा हो, तभी इस प्रकार के प्रयोग को अंतिम उपाय के रूप में अपनाया जाना चाहिए। तंत्र शक्ति का उपयोग छोटे मोटे कारणों से नहीं किया जाता।

–आवश्यक सामग्री–

इस प्रयोग के लिए अत्यधिक सामग्री की आवश्यकता नहीं होती। मुख्यतः तीन वस्तुएँ अपेक्षित हैं—

शमशान के मुर्दे का कफ़न का टुकड़ा 12× 12 इंच का हो 

पुराने लोहे की कील या शमशान के बांस की तीली बना ले 

काली स्याही (बाज़ार से अथवा काजल एवं सरसों के तेल से बनी हो )

इसके अतिरिक्त सामान्य पूजन सामग्री जैसे अक्षत, दीपक, मोली या काला धागा आदि।

🪬साधना की तैयारी🪬

साधना एकांत, स्वच्छ और शांत स्थान में की जानी चाहिए। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके आसन ग्रहण करें। सामने चौकी पर लाल अथवा काला वस्त्र बिछाएँ। उस पर अक्षत स्थापित करें तथा सरसों के तेल का दीप प्रज्वलित करें।

क्रिया शुरू करने से पहले अपना शरीर रक्षा घेरा बना ले ये प्रयोग अति उग्र हैं गुरु की देख रख में करे। तत्पश्चात संकल्प लें। यदि विरोध अनेक व्यक्तियों से हो तो “सकल शत्रु” का संकल्प लें, और यदि किसी एक विशेष व्यक्ति से हो तो उसका नाम स्पष्ट रूप से उच्चारित करें।

इसके बाद संक्षिप्त प्राथमिक पूजन क्रम इस प्रकार करें—

श्री गणेश, गुरु  तथा भैरव का ध्यान एवं आवाहन करें। पूजन संक्षिप्त किंतु श्रद्धापूर्ण होना चाहिए।

–मंत्र लेखन विधान है–

कफ़न के टुकड़े को अपने सामने स्थापित करें। उसके चारों कोनों में काली स्याही से लोहे की कील से निम्न मंत्र लिखें

                                       💀मंत्र - “ॐ टं टं टं सकल शत्रु संहारणाय फट् स्वाहा”💀

कफ़न के मध्य भाग में उस व्यक्ति का नाम अंकित करें, जिसकी शत्रुता से आप मुक्ति चाहते हैं। लेखन के समय मन एकाग्र एवं शांत रहे।

 –जप प्रक्रिया- * गुरु एवं गणेश मंत्र जपे*

तत्पश्चात 3 माला उपर्युक्त शत्रु-शांति मंत्र का

जप पूर्ण श्रद्धा, संयम और स्पष्ट उच्चारण के साथ करें।

संकल्पबद्ध समापन करे 

जप पूर्ण होने के पश्चात कफ़न के टुकड़े को आठ बार मोड़ें। प्रत्येक मोड़ के साथ मन में यह भावना दृढ़ करें—

“मेरे जीवन से शत्रुता का अंत हो, समस्त बाधाएँ शांत हों, और धर्ममय मार्ग प्रशस्त हो।”

अब उसे मोली अथवा काले धागे से बांध दें।

*विसर्जन प्रक्रिया*

इसके पश्चात दो विकल्पों में से किसी एक का चयन करें—

किसी सूखे एवं अनुपयोगी कुएँ में विसर्जन करें। या नदी के किसी सुनसान तट पे इसे गड्ढा खोद के दबा दे

अथवा दक्षिण दिशा में स्थित पीपल वृक्ष के समीप भूमि में दबाकर ऊपर पत्थर स्थापित करें।

विसर्जन के बाद पीछे मुड़कर न देखें। शांत मन से सीधे अपने निवास स्थान लौट आएँ। घर आके नहा कर शुद्ध हो जाए

*अंतिम स्थिति प्रयोग की*

यह प्रयोग केवल गंभीर परिस्थिति में, आत्मरक्षा की भावना से और धर्मसम्मत उद्देश्य से ही किया जाना चाहिए। सच्चा साधक जानता है कि सर्वोच्च शक्ति क्षमा, धैर्य और सद्कर्म में निहित है। तांत्रिक साधना का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं, संतुलन और शांति की स्थापना है।

–विशेष ध्यान –

ये साधना प्रयोग बाहोत उग्र और घातक हैं, गुरु निगरानी में करे, करने से पहले गहराई से सोचले अन्यथा खुद के हानि के जिम्मेदार खुद होंगे |


गुरुजी –91 9207283275

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जय महाकाल । आदेश









माँ धूमावती मंत्र : स्वरूप उत्पत्ति और साधना ,संकट से मुक्ति,



जय महाकाल आदेश
 

माँ धूमावती मंत्र : स्वरूप, उत्पत्ति और साधना ,संकट से मुक्ति:–


माँ धूमावती मंत्र  साधना ,संकट से मुक्ति

मंत्र –
ॐ काग दत्तो बिकोवा।धड़ित धड़ धडात।ध्यायमान भवानी दैत्यनाम।
देहनाशनाम तोड्यांती।पिशाचा त्रिहाप त्रिहाप हसंती।खड़त खद खदात।
त्रिरोष मम धूमावती ।नौ नाथ चौरासी सिद्धों के बीच बैठकर धूमावती मंत्र स्वाहा:


माँ धूमावती मंत्र : स्वरूप, उत्पत्ति और साधना ,संकट से मुक्ति:–

दस महाविद्याओं में माँ धूमावती का स्थान सातवाँ माना गया है। उनका स्वरूप अत्यंत उग्र, रहस्यमय और वैराग्य से युक्त है। वे उस शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं जो अभाव,
विरक्ति, धैर्य और गहन तप से जुड़ी हुई है। यद्यपि उनका स्वरूप भयावह माना जाता है, फिर भी वे लक्ष्मी स्वरूपा हैं, अर्थात् कठिन परिस्थितियों में भी साधक को आत्मबल,
विवेक और आंतरिक शक्ति प्रदान करती हैं।

माँ धूमावती की उत्पत्ति से जुड़ी मान्यताएँ:

माँ धूमावती की उत्पत्ति को लेकर अनेक पौराणिक और लोक मान्यताएँ प्रचलित हैं। एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, राजा दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में भगवान शिव को आमंत्रित
नहीं किया गया। माता सती ने इसे शिव का अपमान माना और यज्ञ अग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया। उस अग्नि से उठने वाला धुआँ ही माँ धूमावती के रूप में प्रकट हुआ।
इसी कारण उनका नाम “धूमावती” पड़ा, अर्थात् धुएँ से उत्पन्न देवी।

कुछ अन्य कथाएँ उन्हें अलक्ष्मी या दरिद्रता की देवी भी कहती हैं, किंतु तांत्रिक परंपरा में वे केवल अभाव की नहीं, बल्कि संकटों से उबारने वाली महाशक्ति मानी जाती हैं।
वे साधक को जीवन के कठोर सत्य से परिचित कराती हैं और आंतरिक भय, भ्रम व शत्रुत्व से मुक्त करने में सहायक होती हैं।

नाथ संप्रदाय और माँ धूमावती
नाथ संप्रदाय में माँ धूमावती की विशेष उपासना का उल्लेख मिलता है। प्रसिद्ध योगी और सिद्ध चरपटनाथ को माँ धूमावती का उपासक माना जाता है। उन्होंने माँ धूमावती पर
अनेक ग्रंथों की रचना की और शाबर मंत्रों की परंपरा को आगे बढ़ाया। नाथ योगियों के लिए धूमावती साधना अत्यंत गोपनीय और प्रभावशाली मानी जाती है।

शाबर धूमावती मंत्र
माँ धूमावती से संबंधित शाबर मंत्र अत्यंत प्राचीन और प्रभावी माने जाते हैं। ये मंत्र सामान्य वैदिक मंत्रों से भिन्न होते हैं और लोकभाषा व सिद्ध परंपरा से जुड़े होते हैं।
इन मंत्रों का प्रयोग साधक द्वारा आत्मरक्षा, बाधा निवारण और नकारात्मक प्रभावों से मुक्ति के उद्देश्य से किया जाता है।

शाबर धूमावती साधना किस लिए करनी चाहिए:–
यह साधना मुख्य रूप से उन साधकों के लिए बताई जाती है, जो अपने जीवन में:

जब साधक को लगता हो लगातार विरोध,मानसिक दबाव,नकारात्मक प्रभाव,या बाहरी बाधाओं से परेशान हों।
इस साधना का उद्देश्य किसी को हानि पहुँचाना नहीं, बल्कि साधक को नकारात्मक शक्तियों, शत्रुतापूर्ण भावनाओं और बाधाओं से सुरक्षित करना है।

शाबर धूमावती साधना की विधि:·

यह साधना ३१ दिनों तक की जाती है।

साधना विधि इस प्रकार है:

इस मंत्र को नवरात्रि, गुप्त, नवरात्रि या शाकंभरी नवरात्री में किया जा सकता है 
प्रतिदिन रात 10 बजे के बाद मंत्र जप करें।मंत्र का 11 माला (रुद्राक्ष की माला से) जप करें।सरसों के तेल का दीपक जलाएँ।माँ को हलवा या कुछ मीठा  का भोग अर्पित करें।
जप घर के बाहर या एकांत स्थान पर किया जाए।साधना के नियमसाधक का मुख दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए।आसन के लिए काला कंबल प्रयोग करें।माला केवल
रुद्राक्ष की हो।साधना की शुरुआत मंगलवार से करें।साधना के समय मन शांत, संयमित और एकाग्र रखें।साधना पूर्ण होने के बाद ३१दिनों की साधना पूर्ण होने के पश्चात विशेष हवन करना हे उग्र सामग्री
द्वारा जो यहां लिखना ठीक नहीं है अगर कोई साधक इच्छूक हो उसे बता दिया जाएगा

अगले ३१दिनों तक प्रतिदिन माँ धूमावती की प्रार्थना करें।यदि किसी विशेष परिस्थिति में तुरंत मानसिक शक्ति की आवश्यकता हो, तो मंत्र का 108 बार जप करके माता से संरक्षण
की प्रार्थना करें।

उद्देश्य:–
माँ धूमावती की साधना अत्यंत गंभीर और गूढ़ साधना मानी जाती है। यह केवल श्रद्धा, अनुशासन और संयम के साथ ही फलदायी होती है। यह साधना साधक को बाहरी संघर्षों के
साथ-साथ आंतरिक भय और दुर्बलताओं से भी मुक्त करने में सहायक मानी जाती है। माँ धूमावती का मार्ग कठिन अवश्य है, परंतु सत्य, धैर्य और आत्मबल की ओर ले जाने वाला है।

( कोई भी दस महाविद्या की उग्र साधना गुरु निर्देश में करने का प्रयास करे सफलता के आसार अधिक और खतरा नामशेश रहेगा )

जय महाकाल आदेश 



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गुरुजी – 9207283275







Saraswati सरस्वती शाबर मंत्र विद्या, बुद्धि और मेधा शक्ति बढ़ाने की सिद्ध साधना

                              


|| जय महाकाल आदेश ||


–: विद्या दात्रि सरस्वती मंत्र :–

Saraswati सरस्वती शाबर मंत्र विद्या, बुद्धि और मेधा बढ़ाने की सिद्ध साधना 

सरस्वती शाबर मंत्र विद्या, बुद्धि, स्मरण शक्ति और ज्ञान में वृद्धि करने के लिए एक अत्यंत प्रभावशाली और सरल साधना मानी जाती है। जो विद्यार्थी पढ़ाई में एकाग्रता नहीं बना पाते, प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार असफल होते हैं या जिनकी बुद्धि कुंद हो गई है, उनके लिए यह मंत्र विशेष रूप से लाभकारी बताया गया है।

माता सरस्वती को विद्या, ज्ञान, कला और वाणी की देवी माना जाता है। उनकी उपासना से व्यक्ति की सोच, समझ और स्मरण शक्ति में सकारात्मक परिवर्तन आता है। सरस्वती शाबर मंत्र अन्य वैदिक मंत्रों की तुलना में सरल होते हैं, जिन्हें सामान्य व्यक्ति भी सही श्रद्धा और नियमों के साथ कर सकता है।

इस पोस्ट में हम आपको सरस्वती शाबर मंत्र, उसकी साधना विधि, लाभ, सावधानियाँ और यह मंत्र किसके लिए उपयुक्त है , इन सभी विषयों की जानकारी सरल हिंदी भाषा में देंगे, ताकि आप इसे सही तरीके से समझकर लाभ प्राप्त कर सकें।

यदि आप विद्या प्राप्ति, बुद्धि विकास और मानसिक एकाग्रता बढ़ाने का उपाय खोज रहे हैं, तो यह सरस्वती शाबर मंत्र साधना आपके लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकती है।


साधक मित्रो जो भी व्यक्ति साधना क्षेत्र में विजय प्राप्त करना चाहते हैं उनके लिए सरस्वती मा का आशीर्वाद
लिए बिना साधना क्षेत्र अधूरा है समझ लीजिए सरस्वती मां ज्ञान दरवाजा खोल कर साधक के जीवन में प्रकाश
उजाला भर देती है उसका जीवन धन्य कर देती है, तो साधक मित्रो आज आपके लिए सरस्वती मंत्र प्रस्तुत किया
जा रहा है जिसकी साधना करके अपने जीवन में उन्नति अवश्य कर सकते हो |


विद्या दात्रि सरस्वती मंत्र

विद्या दात्रि – सरस्वती शाबर मंत्र –


१) ॐ ऐं वद वद वाग्वादिनी मा तुम आओ ॐ नमो आदेश गुरु को।" 
२)"ॐ नमो भगवती श्री महा सरस्वती ह्रीम ह्रीम ठह ठह स्वाहा।" 


(ज्ञान, स्मरण शक्ति और कार्य सिद्धि में  विशेष प्रभावी)। 

– साधना विधि –

स्थान और समय: किसी शांत जगह पर सरस्वती माँ का चित्र या यंत्र किसी पट्टे पर स्थापित करें। रविवार या 
शुक्रवार का दिन शुभ माना जाता है।
सामग्री: धूप, दीप, अक्षत (चावल), वस्त्र, और मिट्टी के दीपक हों तो अति उत्तम
मंत्र जाप: ऊपर दिए गए मंत्रों में से किसी एक का चुनाव करें और उसका नियमित जाप करें। स्फटिक की माला
 का प्रयोग उत्तम माना जाता है।
अनुष्ठान: मंत्र का जाप करते समय विधि में कोई बदलाव न करें। एक घंटे या अपनी क्षमतानुसार जाप करें, फिर माँ से आशीर्वाद की प्रार्थना करें।
 यदि साधना पूर्ण हुई : जाप के बाद सामग्री मंदिर में रख दें या किसी वृक्ष के नीचे रख आएं। 
लाभ:–
वाणी में स्पष्टता और ओज आता है।प ढ़ाई और परीक्षा में सफलता मिलती है।स्मृ ति (याददाश्त) और एकाग्रता
 बढ़ती है।जीवन के सभी क्षेत्रों में विद्या और बुद्धि की प्राप्ति होती है। 
महत्वपूर्ण: किसी भी साधना को शुरू करने से पहले किसी योग्य गुरु का मार्गदर्शन लेना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है
गुरु के बगैर समझो साधना ना के बराबर है ऐसा समझो |


बाहोत बार साधक को सरस्वती सिद्ध नहीं होती कमजोर राशि के होने के कारण सफ़ल हो नहीं पाते वो साधक
नीचे दिए गए किसी एक मंत्र का अपनी राशी अनुसार जाप करे एक महीने नित्य नियम से साधना में अवश्य 
सफलता मिल सकती है 

{ अन्य सरस्वती मंत्र }


मेष- ॐ महाभद्रायै नम:।
वृषभ- ॐ महापातक नाशिन्यै नम:।
मिथुन- ॐ महाविद्यायै नम:।
कर्क- ॐ शिवानुजायै नम:।
सिंह- ॐ सुनासायै नमः।
कन्या- ॐ दिव्यांगाय नम:।
तुला- ॐ मालिन्यै नम:।
वृश्चिक- ॐ विश्वायै नम:।
धनु- ॐ ॐ सौदामिन्यै नम:।
मकर- ॐ वाग्देव्यै नम:।
कुंभ- ॐ तीव्रायै नम:।
मीन-ॐ शारदे नम:।

किसी भी साधना को सफल और सिद्ध बनाने के लिए गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है। गुरु के बिना कोई भी साधना सिद्धि अधूरी मानी जाती है, क्योंकि सही दिशा और सुरक्षा दोनों ही गुरु के माध्यम से प्राप्त होती हैं।


गुरूजी:– +91 9207283275 



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दत्तात्रेय शाबर मंत्र सर्व बाधा संकट में निवारण हेतु गुप्त विधि,




– जय महाकाल आदेश  –


दत्तात्रेय शाबर मंत्र सर्व बाधा संकट में निवारण हेतु गुप्त विधि 


– दत्तात्रेय शाबर मंत्र –


दत्तात्रेय शाबर मंत्र

दत्तात्रेय भगवान – अवतार, जीवन और आध्यात्मिक योगदान

दत्तात्रेय भगवान हिंदू धर्म में एक अद्वितीय और दिव्य ब्रम्ह स्वरुप चैतन्य रूप में पूजे जाते हैं। इन्हें त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) का संयोग माना जाता है, यानी इनमें सृजन, पालन और संहार का सामंजस्य है। उनके व्यक्तित्व और शिक्षाएं केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

–:दत्तात्रेय भगवान के अवतार :–

दत्तात्रेय भगवान के कई अवतार माने जाते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इनकी सबसे प्रसिद्ध अवतार हैं:

अथर्वा ऋषि अवतार – जहां उन्होंने योग, साधना और आध्यात्मिक विज्ञान की शिक्षा दी।

अज्ञानी-ज्ञानवंत अवतार – जिसमें साधक को संसार की मायावी चीज़ों से परे रहकर ज्ञान की ओर मार्गदर्शन दिया।

नागार्जुन और अन्य संतों के माध्यम से उपदेश – दत्तात्रेय की शिक्षाएं समय-समय पर महान संतों और ऋषियों के माध्यम से लोगों तक पहुँचती रहीं।

इन अवतारों का उद्देश्य मानव जीवन में आध्यात्मिक जागरण और मोक्ष की दिशा दिखाना था।

आध्यात्मिक तंत्र में योगदान:–

दत्तात्रेय भगवान का तंत्र और योग क्षेत्र में योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। वे गुरु और साधक के आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनके तंत्र और साधना में मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

एकत्व और आत्म-ज्ञान की शिक्षा:–
दत्तात्रेय ने बताया कि सभी जीवों में एक ही परमात्मा विद्यमान है। इस ज्ञान के माध्यम से साधक अपने अहंकार को त्यागकर आत्मज्ञान प्राप्त करता है।

निरंतर साधना और ध्यान:–
उनके उपदेशों में ध्यान, मंत्र और साधना का विशेष महत्व है। दत्तात्रेय तंत्र में मंत्रों और साधना विधियों का प्रयोग करके साधक मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करता है।

साधक का मार्गदर्शन:–

दत्तात्रेय का तंत्र कहता है कि ज्ञान प्राप्ति के लिए गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है। उन्होंने अपने शिष्यों को न केवल मंत्रों की शिक्षा दी, बल्कि उन्हें धर्म और नीतिशास्त्र के अनुसार जीवन जीने का तरीका भी बताया।

आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग:–

दत्तात्रेय भगवान का तंत्र और शिक्षाएं मुख्य रूप से मुक्ति (मोक्ष) प्राप्ति के लिए हैं। उनके अनुयायी मानते हैं कि सच्चे साधक उनके निर्देशों का पालन करके सांसारिक बंधनों से मुक्त हो सकते हैं।

दत्तात्रेय  भगवान की पूजा और साधना:–

दत्तात्रेय भगवान की पूजा में त्रिदेव का प्रतीकात्मक समावेश होता है। उनके मंत्र, ध्यान और तंत्र साधनाएं साधक को आध्यात्मिक ऊर्जा और मानसिक शांति प्रदान करती हैं।

मंत्र: “ॐ दत्तात्रेयाय नमः”

साधना समय: प्रातःकाल या किसी विशेष योग समय

लाभ: मानसिक शांति, आध्यात्मिक ज्ञान और जीवन में संतुलन

निष्कर्ष:–

दत्तात्रेय भगवान केवल एक देवता नहीं, बल्कि गुरु और मार्गदर्शक हैं। उनके अवतार, शिक्षाएं और तंत्र साधनाएं हमें आत्मा की वास्तविकता, ध्यान और मोक्ष की ओर ले जाती हैं। उनके उपदेशों का पालन करके साधक न केवल अपने जीवन में शांति और संतुलन पा सकता है, बल्कि आध्यात्मिक ऊँचाई तक भी पहुँच सकता है।

दत्तात्रेय भगवान का संदेश सरल है – ज्ञान, भक्ति और साधना के माध्यम से ही मानव जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य प्राप्त किया जा सकता है।


मंत्र
ॐ ह्रिम श्रीं द्राम दत्त दत्त दिगम्बर अवधूत परम हंस दिगम्बर 
त्रयलोक्यनाथ संकट मोचन दिगम्बर भूत प्रेत, पिशाचादि बाधा
विनाशनं कुरु कुरु रोग शोक दुर्भिक्ष दुःख नाशन कुरु कुरु
जय जय श्री गुरुदेव दत्त दिगंबर 
ॐ ह्रिम श्रीं द्राम दत्तात्रेयाय नम:फट फट स्वाहा 


मंत्र साधना गुप्त विधिः 

किसी पवित्र स्थान में एकांत जगह में बैठ इस साधना को पंचमी से या पूर्णिमा से शुरू करे
समय प्रात कल ५ ,६ के मध्य में करने का प्रावधान हैं बाकी साधक अपने समय नुसार करे
परंतु सुबह जितनी जल्दी सूर्योदय से पहले शुरू करे तो उत्तम है, धूप दीप पुष्प अर्पण करे
गुरु महाराज से इस साधना की आज्ञा ले मेरे जीवन में आने वाले संकट का नाश करे और
संसार सुख की प्राप्ति हो या जो मनन करना हो उस अनुसार कह कर शुद्ध आसान पर बैठ
कर एकाग्र हो कर भगवान का जप करे १०८ की संख्या में जप करे नित्य समय का ध्यान रखे
साधना ७,११,२१ दिन तक की जा सकती है , परंतु जितना ज्यादा दिन करेंगे उतनी शक्ति जल्द
अपना असर दिखाएगी जप शुरू करने से पहले दान पुण्य कर के गुरु आज्ञा ले कर साधना
आरम्भ करे इससे साधना शीघ्र सफल हो जाती हे

शाबर मंत्र लाभ:

सांसारिक जीवन में आने वाली कठिनाई से मुक्ति मिलती हे संसार सुखों की प्राप्ति होती है
आरोग्य, धन सम्पदा, में वृद्धि होती है, सुख शांति, होती हैं, भूत, प्रेत,पिशाच बाधा से मुक्ति
मिलती है और अन्य लाभ प्राप्ति होती है|



गुरुजी :  9207283275







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