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रक्षाबंधन की रात का तांत्रिक रक्षा सूत्र, साधकों के बीच प्रचलित एक पुरानी परंपरा

 


रक्षाबंधन की रात का तांत्रिक रक्षा सूत्र:

साधकों के बीच प्रचलित एक पुरानी परंपरा:

श्रावण मास की पूर्णिमा आते ही रक्षाबंधन की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। घरों में राखियां सजती हैं, पूजा की थाली तैयार होती है और भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उसके सुख, स्वास्थ्य और मंगल की कामना की जाती है। लेकिन रक्षा सूत्र की परंपरा केवल भाई-बहन के रिश्ते तक सीमित नहीं रही है। भारतीय धार्मिक और साधना परंपराओं में रक्षा-सूत्र का प्रयोग यज्ञ, पूजा, व्रत, अनुष्ठान और संकल्प के अवसर पर भी लंबे समय से होता आया है। जय महाकाल दोस्तो और साधकों 


साधना मार्ग से जुड़े लोगों के लिए श्रावण पूर्णिमा की रात अपने इष्टदेव, गुरु और साधना-संकल्प का स्मरण करने का अवसर मानी जाती है। इसी क्रम में कुछ साधक पूजा के बाद मौली या सूती धागे को रक्षा-सूत्र के रूप में धारण करते हैं।

यहां “तांत्रिक रक्षा सूत्र” से आशय किसी चमत्कारी वस्तु से नहीं, बल्कि मंत्र-जप, पूजा और संकल्प के साथ धारण किए गए उस सूत्र से है जिसे साधक अपनी साधना और आराध्य के प्रति निष्ठा की याद के रूप में रखता है।

रक्षा सूत्र की पुरानी परंपरा:- 

हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों में मौली या कलावा बांधने की परंपरा बहुत पुरानी है। यज्ञ अथवा किसी धार्मिक संकल्प के समय आचार्य द्वारा यजमान की कलाई पर सूत्र बांधा जाता है। कई स्थानों पर व्रत, पूजा और संस्कारों के दौरान भी रक्षा-सूत्र धारण कराया जाता है।

इस सूत्र का महत्व उसके धागे की कीमत या बाहरी सजावट में नहीं, बल्कि उस संकल्प में माना जाता है जिसके साथ उसे बांधा जाता है। व्यक्ति जब किसी धार्मिक कार्य का संकल्प लेता है, तो कलाई पर बंधा सूत्र उसे उस संकल्प की याद दिलाता रहता है।

समय के साथ रक्षा-सूत्र की यही परंपरा रक्षाबंधन के पर्व से भी गहराई से जुड़ गई।

श्रावण पूर्णिमा की रात और साधना- 

श्रावण पूर्णिमा धार्मिक दृष्टि से अनेक परंपराओं से जुड़ी तिथि है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस दिन रक्षाबंधन, उपाकर्म, ऋषि तर्पण तथा अन्य धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं।

साधना परंपराओं में भी श्रावण मास को शिव उपासना से विशेष रूप से जोड़ा जाता है। इसलिए इस रात साधक अपने इष्टदेव, गुरु या कुलदेवता का स्मरण करते हुए जप और ध्यान करते हैं।

यदि कोई साधक पहले से किसी गुरु-मंत्र या इष्ट मंत्र की साधना करता है, तो रक्षा-सूत्र की पूजा में किसी नए मंत्र के पीछे भागने के बजाय उसी परिचित मंत्र का जाप करना अधिक सहज और उचित है।

रक्षाबंधन की रात कौन-सा मंत्र बोलें?

रक्षा-सूत्र धारण करते समय एक प्रसिद्ध पारंपरिक मंत्र का उच्चारण किया जाता है,

१) “येन बद्धो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥”

अगर तंत्र साधना जाप करना हो तो निम्न मंत्र का ११ माला जप करे
ये जप करने से भी अन्य बाधाओं से रक्षा होगी 

२)  ॐ उग्रनृृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि तन्नोनृसिंह प्रचोदयात् ।

इस मंत्र में राजा बलि का उल्लेख आता है। मंत्र का भाव यह है कि जिस रक्षा-सूत्र से अत्यंत शक्तिशाली राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षा-भाव से यह सूत्र धारण किया जा रहा है।

इसे मंत्र-साधना की तरह लंबा अनुष्ठान बनाने की आवश्यकता नहीं है। रक्षा-सूत्र की पूजा करते समय श्रद्धा से इसका उच्चारण किया जा सकता है।

यदि साधक किसी गुरु या इष्टदेव का नियमित मंत्र करता है, तो उसके बाद अपने गुरु-मंत्र या इष्ट मंत्र का जाप करना भी अपनी परंपरा के अनुसार किया जा सकता है।

रक्षा सूत्र कैसे तैयार करें?

रक्षाबंधन के दिन या शाम को स्नान करके पूजा स्थान को स्वच्छ कर लें। एक साफ थाली में लाल या पीले रंग का सूती धागा, चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप और दीपक रखें।

सबसे पहले अपने गुरु, इष्टदेव या कुलदेवता का स्मरण करें। दीपक जलाकर धागे को पूजा की थाली में रखें। उस पर चंदन और अक्षत अर्पित करें।

इसके बाद ऊपर दिया गया रक्षा-सूत्र मंत्र श्रद्धा से बोलें। चाहें तो अपने इष्ट मंत्र का भी कुछ समय तक जाप करें।

यहां सबसे जरूरी बात यह है कि धागे को किसी विशेष चमत्कारी वस्तु के रूप में न देखें। साधना परंपरा में सूत्र के साथ जुड़ा संकल्प और श्रद्धा अधिक महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

कितनी बार मंत्र का जाप करें?

यदि आप केवल रक्षा-सूत्र धारण कर रहे हैं तो मंत्र का एकाग्र होकर उच्चारण करना पर्याप्त है। जो साधक मंत्र-जप की नियमित परंपरा में हैं, वे अपनी गुरु-परंपरा में निर्धारित संख्या का पालन करें।

सिर्फ रक्षाबंधन के दिन इंटरनेट से कोई कठिन संख्या या लंबा अनुष्ठान देखकर उसे करने की आवश्यकता नहीं है। मंत्र-साधना में अपनी परंपरा और गुरु के निर्देश को प्राथमिकता देना ही उचित है।

रक्षा सूत्र धारण करने की विधि:- 

पूजा और मंत्र-जप के बाद रक्षा-सूत्र को कलाई पर बांधा जा सकता है। पुरुष सामान्यतः दाहिनी कलाई में और महिलाएं अपनी पारिवारिक या धार्मिक परंपरा के अनुसार कलाई में इसे धारण करती हैं।

सूत्र बांधते समय मन में अपने गुरु, इष्टदेव और परिवार के कल्याण की प्रार्थना करें।

यदि यह सूत्र किसी विशेष साधना-संकल्प के लिए धारण किया जा रहा है, तो मन में उस संकल्प को स्पष्ट रखें। उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति नियमित जप करने का संकल्प ले रहा है तो रक्षा-सूत्र उसके लिए उस संकल्प की स्मृति बन सकता है।

साधकों के लिए इसका क्या अर्थ है?

साधना के मार्ग में मन को एकाग्र रखना हमेशा आसान नहीं होता। कई बार व्यक्ति कुछ दिनों तक नियमपूर्वक जप करता है और फिर धीरे-धीरे उसका अनुशासन कमजोर पड़ने लगता है।

ऐसे में संकल्प के साथ धारण किया गया रक्षा-सूत्र साधक को उसके उद्देश्य की याद दिलाता रहता है। गुरु से मिला सूत्र हो, किसी पूजा के बाद धारण किया गया कलावा हो या अपने इष्टदेव के सामने संकल्प लेकर बांधा गया साधारण धागा—उसका महत्व उससे जुड़े विश्वास और अनुशासन में होता है।

इसी कारण साधना परंपराओं में साधारण वस्तुओं को भी भाव और विधि के साथ विशेष स्थान मिला है।

क्या इसे तांत्रिक साधना माना जाए?

“तांत्रिक रक्षा सूत्र” शब्द सुनकर कई लोगों को लगता है कि इसके पीछे कोई अत्यंत गुप्त या चमत्कारी विधि होगी। वास्तव में ऐसा दावा करना उचित नहीं है।

तंत्र की अलग-अलग परंपराओं में रक्षा-विधान और मंत्रों की अपनी-अपनी विधियां रही हैं। गुरु-दीक्षित साधना में प्रयुक्त किसी विशेष रक्षा-विधान को सामान्य व्यक्ति द्वारा इंटरनेट पर पढ़कर दोहराना उचित नहीं माना जाता।

इसलिए गृहस्थ साधक के लिए रक्षाबंधन की रात सरल पूजा, इष्ट-स्मरण, पारंपरिक रक्षा-सूत्र मंत्र और अपने नियमित मंत्र का जाप ही पर्याप्त रखा जा सकता है।

बाजार की राखी और रक्षा सूत्र में अंतर:- 

आज रक्षाबंधन के लिए तरह-तरह की आकर्षक राखियां मिलती हैं। उनमें धातु, मोती, रुद्राक्ष, पत्थर और कई प्रकार की सजावटी सामग्री लगी होती है।

इनका अपना सौंदर्य है, लेकिन धार्मिक दृष्टि से रक्षा-सूत्र के लिए महंगी सामग्री आवश्यक नहीं है। पूजा के बाद श्रद्धा से धारण किया गया साधारण सूती धागा भी रक्षा-सूत्र के रूप में रखा जा सकता है।

यही कारण है कि मंदिरों और धार्मिक अनुष्ठानों में आज भी मौली या कलावा जैसी साधारण सामग्री का प्रयोग दिखाई देता है।

एक बात साधकों को हमेशा याद रखनी चाहिए:- 

रक्षाबंधन की रात किसी भी साधना को केवल इसलिए न करें कि उससे तत्काल कोई चमत्कार होगा या कोई अदृश्य शक्ति प्राप्त हो जाएगी। साधना में जल्दबाजी अक्सर व्यक्ति को भ्रमित करती है।

यदि आप किसी गुरु से दीक्षित हैं तो उसी गुरु-परंपरा के नियमों का पालन करें। और यदि आप सामान्य गृहस्थ हैं तो अपने इष्टदेव का स्मरण, पारंपरिक मंत्र-जप और सरल पूजा के साथ रक्षा-सूत्र धारण कर सकते हैं।

रक्षा-सूत्र का वास्तविक भाव यही है कि मनुष्य अपने जीवन में शुभ संकल्प को बांधकर रखे और समय-समय पर उसे याद करता रहे।

रक्षाबंधन की रात जब पूजा का दीपक जलता है और कलाई पर रक्षा-सूत्र बंधता है, तब उस छोटे से धागे में परिवार के प्रति प्रेम, गुरु के प्रति श्रद्धा और अपने आराध्य के प्रति विश्वास—तीनों भाव एक साथ जुड़ जाते हैं। शायद इसी वजह से रक्षा-सूत्र की यह पुरानी परंपरा आज भी लोगों के मन से जुड़ी हुई है।


गुरूजी:- 9207283275








सांप भय नाशक एवं सर्प भगाने का मंत्र विधि सहित संपूर्ण जानकारी

 

सांप भय नाशक एवं सर्प भगाने का मंत्र – विधि सहित संपूर्ण जानकारी


भारत की प्राचीन तांत्रिक और आध्यात्मिक परंपराओं में सर्पों से रक्षा हेतु अनेक मंत्रों और साधनाओं का वर्णन मिलता है। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों और वन-प्रदेशों में रहने वाले लोगों के लिए यह ज्ञान अत्यंत उपयोगी माना गया है। सर्प केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक भय का भी कारण बनते हैं। ऐसे में यह “सांप भय नाशक एवं सर्प भगाने का मंत्र” अत्यंत प्रभावशाली और प्रचलित माना जाता है।


सर्प भगाने का मंत्र विधि सहित संपूर्ण जानकारी

🔱 मंत्र:–

“दुहाई राजा जन्मेजय, दुहाई आस्तिक मुनि की

दुहाई जरुतकार की, दुहाई मनसा देवी की”

🧘‍♂️ मंत्र का महत्व:–

यह मंत्र चार महान शक्तियों का आह्वान करता है—

राजा जन्मेजय – जिन्होंने नाग यज्ञ कर सर्पों का नाश किया था

आस्तिक मुनि – जिन्होंने सर्पों को विनाश से बचाया

जरुतकार (जरत्कारु) – नागवंश से संबंधित ऋषि

मनसा देवी – सर्पों की अधिष्ठात्री देवी

इन सभी का स्मरण करने से सर्पों से रक्षा होती है और उनका भय समाप्त होता है। यह मंत्र केवल भौतिक सर्पों को दूर करने के लिए ही नहीं, बल्कि मन के अंदर बसे भय और नकारात्मक ऊर्जा को भी समाप्त करता है।

📿 साधना की विधि:–

इस मंत्र की सिद्धि के लिए निम्न विधि अपनानी चाहिए—

. समय चयन

यह साधना किसी भी शुभ दिन से शुरू की जा सकती है

विशेष रूप से नाग पंचमी, अमावस्या, या पूर्णिमा के दिन प्रारंभ करना उत्तम रहता है

प्रतिदिन सुबह या संध्या समय इसका जप करें

. स्थान और आसन

किसी शांत और स्वच्छ स्थान का चयन करें कुश या ऊन का आसन बिछाएं

उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें

. पूजन सामग्री

एक दीपक (सरसों या घी का) अगरबत्ती या धूप

जल से भरा पात्र मनसा देवी का चित्र (यदि उपलब्ध हो)

. जप विधि

पहले भगवान गणेश का स्मरण करें फिर मनसा देवी का ध्यान करें

इसके बाद ऊपर दिए गए मंत्र का १०८ बार जप करें

रुद्राक्ष की माला का उपयोग करना अधिक फलदायक माना जाता है

. अवधि

इस साधना को ११ दिन या २१ दिन तक लगातार करें

पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ जप करना आवश्यक है

🐍 प्रयोग विधि (सर्प भगाने हेतु)

जब यह मंत्र सिद्ध हो जाए, तब इसका प्रयोग इस प्रकार करें—

यदि कहीं सांप दिखाई दे, तो शांत मन से इस मंत्र का उच्चारण करें

मंत्र बोलते समय भूमि पर हल्के से तीन बार फूंक मारें

या पानी में मंत्र पढ़कर उस जल को चारों ओर छिड़क दें

ऐसा करने से सर्प उस स्थान को छोड़कर चला जाता है।

⚠️ सावधानियां

मंत्र का प्रयोग केवल रक्षा और कल्याण हेतु करें, किसी को हानि पहुंचाने के लिए नहीं

साधना के दौरान सात्विक आहार और शुद्ध आचरण रखें

भय या घबराहट में मंत्र का गलत उच्चारण न करें

यदि संभव हो तो गुरु के मार्गदर्शन में साधना करें

🌼 आध्यात्मिक लाभ

इस मंत्र के नियमित जप से—

सर्प भय समाप्त होता है

घर और आसपास का वातावरण सुरक्षित रहता है

मानसिक शांति और आत्मविश्वास बढ़ता है

नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है

🧠 विशेष जानकारी

शास्त्रों में कहा गया है कि सर्प केवल बाहरी जीव नहीं हैं, बल्कि हमारे अंदर के भय, क्रोध और नकारात्मक विचारों के प्रतीक भी हैं। जब हम इस मंत्र का जप करते हैं, तो हम अपने भीतर की उन सभी नकारात्मक शक्तियों को भी नियंत्रित करते हैं।

✨ सीख 

“सांप भय नाशक एवं सर्प भगाने का मंत्र” एक अत्यंत शक्तिशाली और प्रभावशाली मंत्र है, जो सदियों से लोगों द्वारा उपयोग किया जा रहा है। यदि इसे सही विधि और श्रद्धा के साथ किया जाए, तो यह न केवल सर्पों से रक्षा करता है, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति में भी सहायक होता है। तंत्रिक क्रिया प्रणाली में सर्पों के कई क्रिया बताई गई जो अलग अलग कार्यों में उपयोग में लाई जाती हैं इस विषय पर पुन: नई पोस्ट में चर्चा करेंगे तब तक के लिए जय महाकाल 

विशेष लक्ष्य:–

कोई भी तंत्र या मंत्र क्रिया को उपयोग में लाने से पहले गुरु निर्देश का पालन  अवश्य करे अन्यथा हानि के जिम्मेदार स्वयं होंगे !


गुरुजी :- + 91 9207283275






विशेष मंत्र साधना ज्ञान

जय महाकाल 










विशेष मंत्र साधना ज्ञान 

 साधक मित्रो कई साधक  है जो कई समय से तांत्रिक  मंत्रो को जागृत करने में लगे हुए है मगर आज तक उनको  सफलता प्राप्त नहीं हुई.. ऐसे साधक निराश हताश हुए बैठे हैं। .   इसका कारन क्या है , तो मित्रो इसका विशेष कारन है पहले आप को अपने इष्ट देवता की कृपा दृष्टी  पाना बहोत ही आवश्यक हैं। ..  उसके बगेर कोई भी मन्त्र या तंत्र सिद्ध नहीं होता यह कटु सत्य है। ...... , अन्यथा साधना करके समय बर्बाद करने जैसा हैं अर्थात  व्यर्थ् है या फिर किसी गुरु के सानिध्य में रह कर साधना करना जरूरी हैं। .. .या फिर किसी पारंगत यानि तैयार गुरु का मार्गदर्शन ले  तब ही आप अपने प्रयास में सफल हो पाएंगे ..किसी तंत्र  जानकार को  अपना गुरु बनाने की इच्छआ जाहिर करे , वोह आप को अवश्य मार्गदर्शन करेंगे .मगर एक बात। ..  आप का उद्देश्य योग्य होना चाहिए ..
जब तक आप किसी गुरु से दीक्षा नहीं ले लेते  तब तक आप को एक साधक होने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होगा ..
यह सारे नियम साबर मंत्रो , या नाथ पन्थो के  ,या अघोर पन्थो के  संप्रदाय में लागु होता है ..
तो मित्रो उचित कार्य प्रणाली को अपनाये और अपना जीवन सार्थक बनाये ..यही हमारी समूचे साधक मित्रो के लिए सन्देश  है ..



जय महाकाल -

जय बम्म भोले आदेश गुरुजी  को 


गुरूजी   - 09207 283 275