तंत्र-मंत्र के बंधन और बंधी हुई विद्या खोलने का मंत्र| गुरु मार्गदर्शन में बंधन-मोचन साधना



|| जय महाकाल || 


तंत्र-मंत्र के बंधन और बंधी हुई विद्या खोलने का मंत्र|
 गुरु मार्गदर्शन में बंधन-मोचन साधना

जय महाकाल साधक मित्रों।

तंत्र की दुनिया बाहर से जितनी रहस्यमय दिखाई देती है, उसके भीतर प्रवेश करने पर उतनी ही अधिक सावधानी की आवश्यकता महसूस होती है। इस मार्ग पर साधक को अपनी साधना, मंत्र और नियमों के साथ अनेक प्रकार के अनुभवों से गुजरना पड़ता है। कुछ अनुभव साधना की अपनी प्रक्रिया से जुड़े होते हैं, कुछ साधक की भूल से और कुछ ऐसी परिस्थितियाँ भी सामने आती हैं जिन्हें समझने के लिए अनुभवी मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ती है।

तांत्रिक परंपराओं में मंत्र-बन्धन, विद्या-बन्धन, साधना में अवरोध और बन्धन-मोचन जैसे विषयों का उल्लेख मिलता है। अलग-अलग परंपराओं में इनके अर्थ और प्रयोग की विधि अलग हो सकती है। इसलिए किसी भी परेशानी को देखते ही उसे तांत्रिक बाधा मान लेना उचित नहीं है।

तांत्रिक बंधन और बंधी हुई विद्या खोलने का मंत्र |

कई बार साधना में अनियमितता, मंत्र के उच्चारण में गलती, नियमों का पालन न करना, साधना-पद्धति को बीच में बदल देना अथवा मानसिक तनाव भी साधक की साधना को प्रभावित कर सकता है। इसलिए अनुभवी साधक किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले पूरी स्थिति को समझने का प्रयास करता है।

विद्या-बन्धन किसे कहा जाता है?

तंत्र-साधना की भाषा में विद्या-बन्धन उस स्थिति के लिए कहा जाता है जिसमें साधक को अपनी सीखी हुई विद्या या मंत्र-साधना में लगातार रुकावट अनुभव होने लगे।

जिस साधना में पहले मन लगता था, उसमें अचानक अस्थिरता आने लगे, मंत्र-जाप में बार-बार व्यवधान हो, साधक अपनी साधना को आगे न बढ़ा पाए अथवा किसी कारण से उसे ऐसा लगे कि उसकी साधना की सहजता समाप्त हो गई है—ऐसी स्थिति को कुछ तांत्रिक परंपराएँ बन्धन से जोड़कर देखती हैं।

लेकिन यहां विवेक रखना बहुत जरूरी है।

हर रुकावट को विद्या-बन्धन नहीं कहा जा सकता।

साधक को पहले अपने नियम, साधना का क्रम, मंत्र-जाप और अब तक की गई प्रक्रिया को देखना चाहिए। यदि समस्या फिर भी बनी रहे तो उसे अपने गुरु के सामने पूरी स्थिति रखनी चाहिए।

तंत्र में गुरु का स्थान:- 

गूढ़ साधना में गुरु की आवश्यकता केवल मंत्र प्राप्त करने तक सीमित नहीं रहती। साधक की स्थिति देखकर साधना की दिशा तय करना, गलत प्रयोग से रोकना और आवश्यकता पड़ने पर साधना में परिवर्तन बताना भी गुरु-परंपरा का हिस्सा है।

एक ही मंत्र का अभ्यास करने वाले दो साधकों की स्थिति हमेशा एक जैसी नहीं होती। किसी के लिए जो विधि उपयुक्त हो, वह दूसरे के लिए उपयुक्त हो यह आवश्यक नहीं।

इसी कारण तंत्र के गंभीर प्रयोगों में अपने स्तर पर निर्णय लेने के बजाय गुरु के निर्देश को प्राथमिकता देना चाहिए।

तंत्र के गूढ़ प्रयोगों में केवल विधि जान लेना पर्याप्त नहीं होता। साधक की स्थिति और साधना की अवस्था को देखकर ही आगे की दिशा तय की जाती है। यही कारण है कि ऐसे प्रयोग गुरु की अनुमति और मार्गदर्शन के बिना नहीं करने चाहिए। परिस्थिति के अनुसार विधि में परिवर्तन भी आवश्यक हो सकता है और उसका निर्णय अनुभवी गुरु ही कर सकते हैं।

साधना में बाधा अनुभव हो तो पहले क्या देखें?

यदि किसी साधक को लगता है कि उसकी साधना में किसी प्रकार का बन्धन या बाहरी अवरोध आया है, तो सबसे पहले इन बातों पर ध्यान देना चाहिए—

क्या साधना नियमित रही है?

क्या गुरु द्वारा बताए गए नियमों का पालन हुआ?

क्या मंत्र-जाप के बीच कोई दूसरा मंत्र जोड़ दिया गया?

क्या साधना का समय या स्थान बार-बार बदला गया?

क्या अपनी ओर से मंत्र, संख्या या विधि में कोई परिवर्तन किया गया?

कई बार साधक स्वयं इन छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज कर देता है और बाद में समस्या को किसी बाहरी शक्ति से जोड़ देता है।

यदि इन सबको देखने के बाद भी स्थिति स्पष्ट नहीं हो रही हो, तो किसी अनुभवी गुरु से सलाह लेना ही उचित मार्ग है।

बन्धन-मोचन से संबंधित पारंपरिक मंत्र:- 

लोक एवं कुछ तांत्रिक साधना-परंपराओं में बन्धन खोलने और बाधा दूर करने की भावना से कई मंत्रों का उल्लेख मिलता है। हमारे पुराने लेख में भी ऐसा ही एक मंत्र दिया गया था।

मंत्र—

“जल खोलू, जल वायु खोलू, टोना खोलू, जादू खोलू,
जंतर खोलू, मंतर खोलू, बंधी हुई विद्या खोलू।
कुल औजू बीरब्बीनास खुलजा, मालिकिन नास खुलजा,
ईला हिन्नास खुलजा, मीन शर्रील वसवासिल खन्नास खुलजा,
अल्जी यूवस्वी सूफी सुदूरिन्नास खुलजा,
मीनल जिन्नती वण्णास खुलजा।। ”

मंत्र के शब्द और उच्चारण अलग-अलग परंपराओं में कुछ भिन्न रूप में मिल सकते हैं। इसलिए इंटरनेट या किसी दूसरे स्रोत से देखकर इसमें अपनी ओर से शब्द जोड़ना या बदलना उचित नहीं है।

यदि यह मंत्र किसी गुरु-परंपरा से प्राप्त हुआ है तो उसी परंपरा में बताए गए उच्चारण और नियम को ही मानना चाहिए।

प्रयोग से पहले आवश्यक बात:- 

यह प्रयोग सामान्य जिज्ञासा के लिए नहीं है। बन्धन-मोचन और विद्या से जुड़े इस प्रकार के गूढ़ प्रयोग गुरु के निर्देश, अनुमति और मार्गदर्शन में ही किए जाने चाहिए।

नीचे दी जा रही विधि पुराने साधना-विवरण में वर्णित परंपरागत प्रक्रिया के संदर्भ में है। इसे पढ़कर कोई व्यक्ति अपने स्तर पर किसी दूसरे व्यक्ति पर प्रयोग शुरू कर दे, यह उचित नहीं होगा।

साधक की अपनी साधना, गुरु-परंपरा और परिस्थिति के अनुसार विधि में अंतर हो सकता है। इसलिए गुरु से प्राप्त निर्देश को किसी भी लिखित विधि से ऊपर रखना चाहिए।

यदि प्रयोग के दौरान ऐसी स्थिति सामने आए जिसे साधक स्वयं समझ न पाए, तो आगे प्रयोग करने के बजाय अपने गुरु से संपर्क करना चाहिए। बिना उचित तैयारी और मार्गदर्शन के गूढ़ प्रयोग करने पर हानि की संभावना रहती है।

पारंपरिक विधि:- 

पुराने साधना-विवरण के अनुसार इस प्रयोग के लिए शुक्रवार का दिन लिया जाता है। संध्या के समय, लगभग पांच बजे के आसपास, स्नान अथवा हाथ-पैर धोकर स्वच्छ वस्त्र पहनकर अपने पूजा-स्थान पर बैठन जाए 

स्थान शांत और एकांत हो। सामने दीपक जलाया जाए तथा सुगंधित धूप या अगरबत्ती रखी जाए। साधक अपने सिर पर स्वच्छ वस्त्र रख सकता है।

यदि साधक गुरु-दीक्षित है तो सबसे पहले गुरु-मंत्र और अपनी परंपरा में बताए गए रक्षा-मंत्र का जाप करना चाहिए।

इसके बाद नई सुगंधित अगरबत्तियों का पैकेट लिया जाता है। पुराने प्रयोग-विवरण में प्रत्येक अगरबत्ती पर मंत्र का जाप करके उसे तैयार करने की बात कही गई है। परंपरागत विवरण में 21 अगरबत्तियों को मंत्र से तैयार करने का उल्लेख मिलता है।

यहां फिर स्पष्ट कर दूँ कि इस पूरी प्रक्रिया को अपने स्तर पर करने के बजाय गुरु से विधि की पुष्टि और अनुमति लेना आवश्यक है।

 इसके बाद बाधित व्यक्ति के सामने दो अगरबत्तियाँ जला ले और उन्हें पूरी तरह जलने तक वहीं रहने दे । इस हिस्से को भी किसी सामान्य घरेलू उपाय की तरह न लिया जाए।

किसी व्यक्ति को सामने बैठाकर ऐसा प्रयोग करने से पहले गुरु की स्पष्ट अनुमति और मार्गदर्शन होना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को शारीरिक या मानसिक परेशानी है तो पहले योग्य चिकित्सकीय सहायता लेना आवश्यक है।

साधना के दौरान असामान्य अनुभव हो तो:- 

पुराने तांत्रिक विवरणों में कभी-कभी साधना के दौरान असामान्य अनुभव या किसी प्रकार की उपस्थिति महसूस होने जैसी बातें भी मिलती हैं। ऐसे अनुभवों को लेकर भय पैदा करना उचित नहीं है और न ही हर अनुभव को निश्चित रूप से किसी बाहरी शक्ति का प्रमाण मानना चाहिए।

यदि साधक को ऐसा कोई अनुभव हो जिसे वह स्वयं समझ नहीं पा रहा है, तो प्रयोग को आगे बढ़ाने के बजाय अपने गुरु को पूरी स्थिति बतानी चाहिए।

यही वह स्थान है जहां गुरु का वास्तविक अनुभव साधक के काम आता है। साधक स्वयं अनुमान लगाकर अगला प्रयोग शुरू करने के बजाय पहले यह समझे कि उसके लिए आगे बढ़ना उचित है भी या नहीं।

साधक की सबसे बड़ी भूल:- 

तंत्र के क्षेत्र में मैंने अक्सर देखा है कि जिज्ञासा के कारण साधक एक साथ कई प्रयोगों की जानकारी इकट्ठी कर लेता है। एक साधना में रुकावट आई तो दूसरा मंत्र, फिर कोई बन्धन-मोचन प्रयोग और उसके बाद कोई अलग साधना।

इस तरह मूल साधना का क्रम ही बिगड़ जाता है।

साधक को यह समझना चाहिए कि गूढ़ साधना में अधिक प्रयोग करना अनुभव की निशानी नहीं है। सही समय पर रुकना और गुरु से दिशा लेना भी साधना की समझ का हिस्सा है।

इसलिए यदि कोई साधना पहले से चल रही है तो बिना कारण उसमें दूसरा प्रयोग न जोड़ें। गुरु ने जिस क्रम में साधना बताई है, उसी क्रम का पालन करें।

किन बातों से बचना चाहिए?

गुरु की अनुमति के बिना किसी गूढ़ प्रयोग को शुरू न करें।

किसी दूसरे साधक की विधि को देखकर अपनी साधना में न मिलाएँ।

मंत्र के शब्द, संख्या या नियम अपनी ओर से न बदलें।

हर असामान्य अनुभव को तुरंत तांत्रिक बाधा न मानें।

किसी दूसरे व्यक्ति पर कोई प्रयोग करने से पहले गुरु से स्पष्ट अनुमति लें।

और यदि साधना के दौरान ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जिसे आप समझ नहीं पा रहे हैं, तो अकेले निर्णय लेने के बजाय अपने गुरु से संपर्क करें।

इन साधनाओं में गुरु का साथ बहुत आवश्यक है। गलत विधि, गलत परिस्थिति अथवा बिना पर्याप्त मार्गदर्शन के किया गया प्रयोग साधक के लिए परेशानी या हानि का कारण बन सकता है।

व्यक्तिगत मार्गदर्शन:- 

यदि कोई साधक लंबे समय से साधना कर रहा है और उसे लगातार किसी प्रकार की बाधा महसूस हो रही है, लेकिन वह यह तय नहीं कर पा रहा कि समस्या साधना की गलती है, मानसिक दबाव है या कोई अन्य कारण, तो केवल इंटरनेट पर पढ़ी हुई जानकारी के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।

ऐसी स्थिति में अपनी साधना का पूरा विवरण, अब तक किए गए प्रयोग और सामने आ रही समस्या किसी अनुभवी गुरु या योग्य साधक के सामने रखना अधिक उचित है।

हर साधक की स्थिति अलग होती है, इसलिए बिना स्थिति समझे किसी व्यक्ति को सीधे कोई गूढ़ प्रयोग बता देना भी उचित नहीं है।

यदि आपकी साधना से संबंधित कोई गंभीर समस्या है और आप उसका उचित मार्गदर्शन चाहते हैं, तो अपनी स्थिति का विवरण देकर व्यक्तिगत मार्गदर्शन के लिए संपर्क कर सकते हैं।

इन विषयों को भी अपनी-अपनी परंपरा और संदर्भ के साथ समझना चाहिए। अलग-अलग साधनाओं की विधियों को आपस में मिलाकर स्वयं कोई नई प्रक्रिया बनाना उचित नहीं है।

अंतिम बात:- 

तंत्र में साधक को केवल मंत्र नहीं, मार्ग चाहिए। मंत्र किसी पुस्तक में मिल सकता है, लेकिन उस मंत्र का समय, नियम, मर्यादा और साधक की अवस्था के अनुसार उसका प्रयोग कैसे करना है—यह समझ और अनुभव गुरु परंपरा से आती है।

इसीलिए गुरु की आवश्यकता को केवल दीक्षा तक सीमित नहीं समझना चाहिए। साधना के कठिन पड़ाव पर सही दिशा मिलना भी उतना ही आवश्यक है।

गूढ़ तांत्रिक साधनाएँ गुरु के निर्देश और मार्गदर्शन में ही करनी चाहिए। उनका साथ और अनुमति साधक के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। बिना उचित मार्गदर्शन के किए गए प्रयोग में हानि संभव है।

जो साधक वास्तव में तंत्र के मार्ग को समझना चाहता है, उसे जल्दबाजी में प्रयोग करने के बजाय सही गुरु, सही विधि और सही अनुशासन के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

जय महाकाल। आदेश

धन्यवाद।


बंधन-मोचन साधना बंधन खोलने वाली विद्या




{ गुरूजी - +91 9207283275 }



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