सूर्य देव की उपासना मंत्र


– जय महाकाल -



– सूर्य देव की उपासना मंत्र-


सूर्यवेदेव साधना  जीवन में तेज, स्वास्थ्य और सफलता का दिव्य मार्ग






जय महाकाल मित्रों!

सूर्य देव से आप सभी भली-भांति परिचित हैं। विज्ञान की दृष्टि से सूर्य एक तारा है, जो पृथ्वी पर जीवन का मूल स्रोत है। परंतु सनातन धर्म, वेद और पुराणों में सूर्य को केवल प्रकाश का पिंड नहीं, बल्कि साक्षात देवता – जगत के चक्षु, ग्रहों के राजा और जीवन ऊर्जा के स्रोत के रूप में पूजा गया है।
ऋग्वेद में सूर्य को सविता, भास्कर, दिवाकर और आदित्य कहा गया है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य आत्मा, पिता, मान-सम्मान, सरकारी पद, नेत्र, हृदय और नेतृत्व क्षमता का कारक माना गया है। यदि कुंडली में सूर्य शुभ हो तो व्यक्ति तेजस्वी, प्रभावशाली और सफल होता है। यदि सूर्य पीड़ित हो तो आत्मविश्वास की कमी, सरकारी बाधाएँ, नेत्र रोग, अपमान या मानसिक तनाव उत्पन्न हो सकते हैं।ऐसी स्थिति में सूर्यवेदेव साधना अत्यंत प्रभावी मानी गई है

🔱 सूर्य देव का आध्यात्मिक महत्व
सूर्य देव को ग्रहों का राजा कहा जाता है। मान्यता है कि सूर्य देव को प्रसन्न करने से अन्य ग्रहों के अशुभ प्रभाव भी शांत हो जाते हैं।
सूर्य केवल भौतिक प्रकाश ही नहीं देते, बल्कि वे आत्मबल, ओज, तेज और निर्णय शक्ति प्रदान करते हैं।

रामायण में वर्णित आदित्यहृदय स्तोत्र का उपदेश महर्षि अगस्त्य ने श्रीराम को युद्ध के समय दिया था। इस स्तोत्र के जप से भगवान श्रीराम को विजय प्राप्त हुई। इससे सिद्ध होता है कि सूर्य साधना संकट नाशक और विजय प्रदायक है।

🌞 सूर्यवेदेव साधना का सही समय

प्रतिदिन सूर्योदय काल सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
रविवार का दिन विशेष फलदायक होता है।
शुक्ल पक्ष में आरंभ करना उत्तम रहता है।
यदि संभव हो तो पूर्व दिशा की ओर मुख करके साधना करें।
🪔 साधना की विधि (क्रमबद्ध प्रक्रिया)

* शुद्धि और संकल्प

प्रातः स्नान कर लाल या सफेद वस्त्र धारण करें। तांबे के लोटे में जल, लाल पुष्प, अक्षत और थोड़ा गुड़ मिलाकर सूर्य को अर्घ्य दें।
अर्घ्य देते समय मन में अपनी मनोकामना का संकल्प लें।
आवाहन मंत्र

ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यंच ।
हिरण्येन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ॥
 ध्यान मंत्र

पद्मासनः पद्मकरो द्विबाहुः सप्ताश्वरथसंस्थितः।
दिवाकरः लोकगुरुः किरीटी मम हृदि स्थितः॥
ध्यान करें कि सूर्य देव अपने सात घोड़ों वाले रथ पर आरूढ़ होकर आपको प्रकाश और शक्ति प्रदान कर रहे हैं।


* सूर्य बीज मंत्र

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सूर्याय नमः ।
इस मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें।

* तांत्रिक मंत्र

ॐ सूं सूर्याय नमः ।
या
ॐ ह्रीं घृणिः सूर्याय नमः ।

सूर्य गायत्री मंत्र

ॐ भास्कराय विद्महे महातेजाय धीमहि ।
तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ॥


– आदित्यहृदय स्तोत्र का महत्व–

॥ आदित्य हृदय स्तोत्र ॥

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् ।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥१॥

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् ।
उपगम्याब्रवीद्राममगस्तो भगवांस्तदा ॥२॥

राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम् ।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि ॥३॥

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् ।
जयावहं जपेन्नित्यं अक्षयं परमं शिवम् ॥४॥

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।
चिन्ताशोकप्रशमनं आयुर्वर्धनमुत्तमम् ॥५॥

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् ।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥६॥

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः ।
एष देवासुरगणान् लोकान् पाति गभस्तिभिः ॥७॥

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः ।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः ॥८॥

पितरो वसवः साध्या अश्विनौ मरुतो मनुः ।
वायुर्वह्निः प्रजाः प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ॥९॥

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान् ।
सुवर्णसदृशो भानुः हिरण्यरेता दिवाकरः ॥१०॥

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् ।
तिमिरोन्मथनः शम्भुः त्वष्टा मार्तण्ड अंशुमान् ॥११॥

हिरण्यगर्भः शिशिरः तपनोऽहस्करो रविः ।
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः ॥१२॥

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः ।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः ॥१३॥

आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः ।
कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोद्भवः ॥१४॥

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः ।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते ॥१५॥

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः ।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ॥१६॥

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः ।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ॥१७॥

नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः ।
नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥१८॥

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूरायादित्यवर्चसे ।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः ॥१९॥

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने ।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ॥२०॥

तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे ।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥२१॥

नाशयत्येष वै भूतं तमेव सृजति प्रभुः ।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ॥२२॥

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः ।
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥२३॥

देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च ।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमप्रभुः ॥२४॥

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च ।
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥२५॥

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् ।
एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥२६॥

अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि ।
एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम् ॥२७॥

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत् तदा ।
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ॥२८॥

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान् ।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥२९॥

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत् ।
सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत् ॥३०॥

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं
मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः ।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा
सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥३१॥

🌞 फलश्रुति
जो श्रद्धा और नियम से इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे विजय, आरोग्य, आत्मबल और सभी कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।
जय सूर्य नारायण! जय श्रीराम! 🌞

आदित्यहृदय स्तोत्र का नियमित पाठ करने से –
शत्रु बाधा समाप्त होती है
आत्मबल और साहस बढ़ता है
मानसिक तनाव दूर होता है
कार्य में विजय प्राप्त होती है
सरकारी नौकरी या पद में सफलता मिलती है
यह स्तोत्र अत्यंत शक्तिशाली है और इसे श्रद्धा एवं नियमपूर्वक करना चाहिए।

🌺 सूर्य साधना के लाभ
 आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता में वृद्धि
 नेत्र एवं हृदय रोगों में सुधार (आध्यात्मिक प्रभाव)
सरकारी कार्यों में सफलता
 समाज में मान-सम्मान
 पिता से संबंधों में सुधार
 आर्थिक स्थिरता
 आलस्य और नकारात्मकता का नाश
 विशेष सूर्य उपाय
रविवार को गेहूँ, गुड़ और लाल वस्त्र का दान करें।
तांबे के बर्तन का प्रयोग बढ़ाएँ।
पिता एवं गुरु का सम्मान करें।

प्रतिदिन कम से कम 5 मिनट सूर्य नमस्कार करें।
सूर्य उदय के समय “ॐ घृणि सूर्याय नमः” का 11 बार जप करें।

साधना में सावधानियाँ–
साधना बिना नियम तोड़े करें।
मांस-मदिरा से दूर रहें।
क्रोध, अहंकार और अपशब्द से बचें।
सात्विक आहार अपनाएँ।

* और कोई भी साधना करने से पहले गुरु आदेश परामर्श जरूर ले *
 सूर्य – आत्मा का प्रतीक
सूर्य देव हमारे भीतर की आत्मा और चेतना का प्रतीक हैं। जब हम सूर्य साधना करते हैं तो बाहरी प्रकाश के साथ-साथ आंतरिक अज्ञान का अंधकार भी समाप्त होता है।
वेदों में कहा गया है –
“तमसो मा ज्योतिर्गमय”
अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।
सूर्यवेदेव साधना हमें यही मार्ग दिखाती है –
अज्ञान से ज्ञान की ओर,
भय से साहस की ओर,
दुर्बलता से शक्ति की ओर।

🌞 निष्कर्ष*

सूर्य साधना केवल मंत्र जप नहीं, बल्कि जीवन शैली है। नियमित अर्घ्य, मंत्र जाप, आदित्यहृदय स्तोत्र का पाठ और सात्विक आचरण – ये सब मिलकर साधक को तेजस्वी, आत्मविश्वासी और सफल बनाते हैं।
जो व्यक्ति श्रद्धा, विश्वास और नियम से सूर्य देव की उपासना करता है, उसके जीवन से बाधाएँ दूर होती हैं और समाज में उसका प्रभाव बढ़ता है।
आप भी सूर्यवेदेव साधना अपनाएँ, अपने जीवन को प्रकाशमय बनाएँ और समाज कल्याण में योगदान दें।
🌞 जय महाकाल! जय सूर्य नारायण! जय अलख आदेश! 🌞


ये उपासना करके अपना और समाज का कल्याण करे  , अपने समस्या का निदान आशातीत हैं 


  जय महाकाल जय अलख आदेश


-- 
https://mantraparalaukik.blogspot.com/



संपर्क -  +919207 283 275






कोई टिप्पणी नहीं: